खाली होते गांवों में सिलौनी भी शुमार हो गया है। स्वास्थ्य सुविधा, बेहतर शिक्षा, रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण 26 परिवारों ने मोटर सड़क की सुविधा मिलने के बाद भी उस माटी को छोड़ दिया है, जिस पर उनके पुरखों और स्वयं उन्होंने जन्म लिया। 132 परिवार वाले गांव में आज 106 परिवार रह गए हैं। केवल मोटर सड़क की सुविधा से पलायन रुकने वाला नहीं है, यह बात देश चलाने वालों को समझ लेनी चाहिए।
महाकाली के किनारे नेपाल सीमा के नजदीक बसे सिलौनी गांव का नाम कभी बेहद संपन्न गांवों में लिया जाता था। खेत खुशबूदार बासमती से लहलहाते थे। वर्ष 1992-93 में गांव जौलजीबी-टनकपुर मार्ग से जुड़ा तो लोगों को उम्मीद थी अन्य सुविधाओं का भी सरकार विकास करेगी, लेकिन असुविधाओं की मार और बंदर, सुअरों के आतंक ने इस गांव का सुख-चैन छीन लिया। सरकार अन्य मूलभूत सुविधा तो दे नहीं पाई। खेती उजाड़ रहे बंदर, सुअरों से निजात दिलाने में भी सरकार नाकाम साबित हुई। गांव के लोगों ने अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य देखभाल के कारण गांव को छोड़ना ही मुनासिब समझा।
वर्ष 2006 में गांव से निकलकर सबसे पहले डंबर बहादुर पाल का परिवार हल्द्वानी बस गया। इसके बाद राजेंद्र सिंह कार्की, देब सिंह कार्की, फकीर सिंह, भगवान सिंह, हयात सिंह, प्रताप सिंह, मोहन सिंह, चंद्र सिंह भाट, दान सिंह बिष्ट समेत 26 परिवार गांव को अलविदा कहकर खटीमा, हल्द्वानी, लखनऊ, दिल्ली चल दिए।
गांव में कौन रहना चाहेगा
सिलौनी के प्रधान राम सिंह बसेड़ा, क्षेत्र पंचायत सदस्य त्रिलोक सिंह बिष्ट, माधवी देवी, गोदावरी देवी, देवकी देवी कहती हैं कि गांव में भूकटाव हो रहा है। बंदर, सुअर खेती उजाड़ रहे हैं। 2008 में हाईस्कूल खुला, लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। मामूली से इलाज के लिए 70 किमी दूर जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। पशु अस्पताल की मांग पूरी नहीं की जा रही है। ऐसी असुविधाएं रहीं तो गांव में कौन रहना चाहेगा।