बस्तड़ी गांव के अमन और पियूष से मिलने पर अपनी भावनाओं को काबू में रखना मुश्किल होता है। दिल से सिर्फ एक ही आवाज निकलती है। इनको इतनी शक्ति मिले कि आपदा से पूरी तरह से उबर जाए। 13 साल के अमन और छह साल के पीयूष ने 30 जून की आपदा को मात देकर जीवन के प्रति अपनी ललक को तो साबित कर ही दिया है। पर जिंदगी का लंबा रास्ता उनके इम्तिहान लेने को शायद अब भी तत्पर है। पीयूष रातों को उठकर मां को बुला रहा है और अमन बड़े भाई का दायित्व निभाते हुये, उसे दिलासा दे रहा है।
ओगला के व्यवसायी दीपक पाठक के घर पर जब में सुबह पहुंचा था तो मौसम में किसी साजिश की बू नहीं थी। ऐसा लग रहा था कि 30 जून की आपदा के बाद जिंदगी अपने सामान्य ढर्रे पर लौट आने की कोशिश में है। 30 जून का ही वह भयावह समय था जब बस्तड़ी के शेखर भट्ट और चंद्रकला अपने जान से प्यारे मासूमों को इस दुनिया में अनाथ छोड़कर काल के मुंह में समा गये थे। मुझे लगा कि उस रात की भयावहता को मैं अमन और पीयूष के चेहरों पर पढ़ पा रहा हूं। अमन और पीयूष बदहवास से दिखाई दे रहे हैं।
कुछ भी बात करने से पहले दिल सहम जाता है। हिम्मत करके मैं बात करने की कोशिश करता हूं तो बच्चों का विश्वास मुझे अंदर तक छील देता है। अमन और पीयूष को लगता है कि मम्मी चंद्रकला और पापा शेखर भट्ट जरूर लौट कर आएंगे। पीयूष तो रातों में उठकर मां को बुलाने की जिद करने लगता है। मां के आंचल की उसे इस समय सबसे ज्यादा जरूरत भी है। अमन को अपने छोटे भाई की तुलना में ज्यादा समझ है। वह अपने छोटे भाई को समझाने का प्रयास करता है।
इन दोनों को उनके करीबी ओगला के व्यवसायी दीपक पाठक ने अपने घर पर रखा है। शेखर भट्ट ओगला में दीपक पाठक की दुकान में ही काम करते थे। अमन सिंघाली के स्कूल में कक्षा आठ में और पीयूष कक्षा एक में पढ़ता है। चार दिन पहले तक जिस घर में खुशहाली थी आज लगता है कि चमन उजड़ गया है। मकान जमींदोज हो गया है। बच्चों के कापी, किताब, खेलने का सामान मलबे में दब गए हैं। बच्चों के संरक्षण की बात करने वाली किसी भी संस्था ने अब तक इन बच्चों से संपर्क नहीं साधा है। बच्चों को अपने साथ रखने वाले दीपक पाठक ने कहा है कि वह बच्चों की पूरी परवरिश करेंगे। उनकी शिक्षा को भी आगे बढ़ाएंगे। इस घटाटोप में दीपक पाठक का इरादा थोड़ी राहत देता है।