कुलेख गांव के वनरावत, इनको नोटबंदी का पता ही नहीं
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125 करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान में लगभग वनरावतों की 575 की आबादी भी शामिल है। इस आदम जनजाति को बड़ी कठिनाई से समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास तो किया गया, लेकिन अब भी वह देश और दुनिया में होने वाली घटनाओं से बेखबर हैं। उनकी अपनी अलग दुनिया है और वह अपने तरीके से जिंदगी को चलाने में यकीन करते हैं। आठ नवंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 के नोटों का प्रचलन बंद करने का एलान किया तो भागीचौरा के निकट कुलेख में रहने वाली वनरावतों की दस परिवारों की करीब 60 की आबादी को इसका कोई पता ही नहीं चला। एक दो घरों में टीवी तो लगा है, लेकिन उनमें समाचार का चैनल कभी नहीं खोला जाता। समाचारपत्र को यह लोग कभी नहीं पढ़ते।
सुबह हर घर के पुरुष और महिलाएं मजदूरी करने के लिए निकल जाते हैं और शाम को जो भी कमाकर लाए उससे भागीचौरा बाजार से राशन खरीदकर चूल्हा जला लिया। बचत खातों, बैंकिंग प्रणाली की इनको कोई जानकारी नहीं है। मनरेगा योजना शुरू हुई तो वनरावतों को भी बैंकों में अनिवार्य रूप से खाता खोलना पड़ गया, पर बैंकों में रुपए जमा रखने की यह जनजाति कभी जरूरत महसूस नहीं करती।
नौ नवंबर के बाद जब दुकानदारों ने वनरावतों से अप्रचलित नोट लेना बंद किया तो उनकी समझ में कुछ नहीं आया। उनकी अज्ञानता का फायदा उठाने वाले भी कम नहीं हैं। कुछ लोग आज भी वनरावतों को मजदूरी के तौर पर 500 का पुराना नोट थमा दे रहे हैं। वनरावत पूरन सिंह ने कहा कि रोज मेहनत-मजदूरी कर चूल्हा जलाने वाले परिवारों के सामने बड़ा संकट आ गया है। बैंकों से पुराने नोट के बदले सिक्के मिल रहे हैं। देवकी देवी, पुष्पा देवी का कहना है कि नोट क्यों बंद किया गया समझ में नहीं आता। अब इन लोगों को काम नहीं मिल रहा है। यदि काम मिला भी तो मजदूरी के लाले पड़ने लगे हैं।
डीडीहाट तहसील मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुलेख गांव के वनरावत शनिवार सुबह आठ बजे ही काम पर निकल गए। घरों में सिर्फ छोटे बच्चे मिले। सुबह यह लोग गडेरी, गीठी की सब्जी उबाल लेते हैं। चावल बनाकर पूरे परिवार को खिलाया जाता है। थोड़ा सा चावल बच्चों के लिए दिन में खाने के लिए रख दिया और सूर्यास्त के बाद ही वह घरों में पहुंचे। भागीचौरा के दुकानदार भरत सिंह ऐरी ने वनरावतों की विवशता को समझते हुए रोज शाम को अपनी दुकान से उधार में राशन देना शुरू कर दिया है। भरत सिंह कहते हैं कि धीरे-धीरे वनरावतों को इस बदलाव का आभास होने लगेगा। कम से कम उनको यह तो समझा ही दिया है कि अब लोभ में आकर भी किसी से मजदूरी में 500 का पुराना नोट ना लें।