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लोक परंपराओं की गहराई से निर्मित है उत्तराखंड की पहचान : प्रो. पाठक

Sat, 14 Mar 2026 11:20 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
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बेड़ीनाग महाविद्यालय में प्रध्यापकों के साथ प्रो. शेखर पाठक। स्रोत: महाविद्यालय
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बेड़ीनाग (पिथौरागढ़) । उत्तराखंड की पहचान केवल पहाड़ों की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह लोकगीतों की धुन, मेलों की भीड़, त्योहारों की उमंग और परंपराओं की गहराई से निर्मित हुई है। यह बात इतिहासकार प्रो. शेखर पाठक ने कहीं।
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प्रो. पाठक राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में इतिहास विभाग की ओर से आयोजित उत्तराखंड गाथा : सामाजिक पहचान निर्माण, निरंतरता एवं परिवर्तन विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की सामूहिक पहचान विविध जातीय समूह और जनजातियों के मेल से बनी है। यहां कठिन जीवन परिस्थितियों के बीच सामुदायिक सहयोग ने समाज को जीवित रखा है। उन्होंने अस्कोट–आराकोट यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि यह 1980 के दशक से प्रारंभ हुई। प्रत्येक दशक में यात्रा करीब 1200 किलोमीटर पैदल तय की जाती है। वर्ष 2024 में इस यात्रा का 50 वां वर्ष पूरा हुआ। उन्होंने बताया कि इन यात्राओं का उद्देश्य हिमालयी ग्रामीण जीवन के संघर्षों और परिवर्तनों को समझना रहा है।
यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दस्तावेज भी है। उन्होंने मनी ऑर्डर अर्थव्यवस्था की अवधारणा समझाते हुए बताया कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था लंबे समय से पलायन और प्रवासी श्रमिकों पर आधारित रही है। उन्होंने कहा कि पलायन ने सामाजिक संरचना को बदल दिया है लेकिन सामुदायिक सहयोग और सांस्कृतिक परंपराएं अब भी इसे जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने पहाड़ संस्था के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसने उत्तराखंड के समाज, संस्कृति और पर्यावरण पर विस्तृत दस्तावेज तैयार किए हैं। इस मौके पर प्राचार्य बीएम पांडेय समेत प्राध्यापक और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
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