1960 के भूकटाव के बाद गर्ब्यांग गांव से तेजी से बढ़ी पलायन की रफ्तार कम करने की कोशिश शुरू होने लगी है। गर्ब्यांग के लोगों ने सेवा समिति नाम से संगठन बनाया है। यह संगठन गांव में जड़ी बूटी उत्पादन, पशुपालन, सब्जी उत्पादन जैसे काम शुरू कर लोगों को स्वरोजगार से जोड़ेगा। प्रयास होगा कि भविष्य में गांव से पलायन कम से कम हो। जो लोग सरकारी सेवाओं से रिटायर हो गए हैं, वह गांव के विकास में सहयोग देंगे। साथ ही, सरकार से भी इन कामों के लिए मदद मांगी जाएगी।
धारचूला से 65 किमी दूर स्थित गर्ब्यांग में पहले 646 परिवार रहते थे। दारमा घाटी का यह सबसे बड़ा गांव था। 1960 में गांव में हुए भूस्खलन के बाद 246 परिवार गांव छोड़कर चले गए। अभी गांव में 400 परिवार रहते हैं। इनमें से 365 परिवार शीतकाल में मौसमी प्रवास पर घाटी वाले इलाकों में निकल जाते हैं। गर्ब्यांग सेवा समिति की रविवार को धारचूला के गर्ब्यांग जनमिलन केंद्र में हुई पहली बैठक में मध्य प्रदेश से रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी महिमन सिंह गर्ब्याल ने कहा कि अब सरकारी सेवाओं में अवसर कम हो रहे हैं। यदि गांव के लोग स्वैच्छिक तरीके से विकास की सोचें तो इसका लाभ मिलेगा। समिति गांव के पुराने घरों और मंदिरों का संरक्षण करेगी।
इस मौके पर सेवा समिति के लिए गोविंद गर्ब्याल को अध्यक्ष, धर्र्मेंद्र गर्ब्याल को उपाध्यक्ष, कृष्णा गर्ब्याल को महासचिव, कृष्ण सिंह को सचिव, गोपाल सिंह को कोषाध्यक्ष, महिराज सिंह को संप्रेषक, जमन सिंह, दीवान सिंह, डा. देवेंद्र सिंह, संजय सिंह, आनंद सिंह को संरक्षक, सतीश सिंह, गणेश सिंह, अर्जुन सिंह, सनम सिंह बनाया गया।