मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। 1857 की क्रांति की अलख जगाते हुए 22 वर्ष एक माह 25वें दिन स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में इंकलाब का नारा लगाते हुए त्रिलोक सिंह पांगती ने अपनी शहादत दे दी। मुनस्यारी में उनकी जयंती पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
आज एक नवंबर को शहीद का जन्म दिन है। त्रिलोक सिंह पांगती पिथौरागढ़ जनपद के एकमात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं जो आजादी के संघर्ष में शहीद हो गए थे। शहीद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी त्रिलोक सिंह पांगती का जन्म एक नवंबर 1920 को ग्राम पंचायत दरकोट में मानसिंह पांगती के घर में हुआ। 1935 में मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद त्रिलोक सिंह ने लास्पा के प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन कार्य किया। गांधी जी की विचारधारा से और अधिक प्रभावित होकर चीन सीमा से लगे मुनस्यारी तथा धारचूला क्षेत्र में घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार प्रचार का झंडा थामा।
गोरे सिपाहियों ने तिरंगा झंडा जो आश्रम के बाहर फहराया गया था। गोरे हथियार बंद सिपाहियों को धक्का देकर तिरंगा झंडे को थाम लिया। इस नौजवान के इस हौसले को देखते हुए दमनकारी गोरे सैनिकों ने त्रिलोक सिंह के ऊपर लाठी, डंडों, बंदूकों के बटों से तीखा प्रहार किया। लहूलुहान होने के बाद भी त्रिलोक सिंह ने तिरंगा झंडा को झुकना नहीं दिया गया। 9 अगस्त 1942 को अल्मोड़ा जेल में बंद कर दिया। जेल में घायल त्रिलोक सिंह का स्वास्थ्य बेहद खराब हो गया। उन्हें 10 अक्तूबर 1942 को अल्मोड़ा सदर अस्पताल में भर्ती किया गया। 11 अक्तूबर 1942 को उन्हें जेल से भी मुक्त कर दिया गया था।
शारीरिक दुर्बलता और अंग्रेजों के अत्याचार के कारण महान सपूत ने 22 वर्ष एक माह 25 दिन की आयु में 26 दिसंबर 1942 को भारत माता के चरणों में अपने को समर्पित कर दिया। 26 दिसंबर को त्रिलोक सिंह की शहादत को शहादत दिवस के रूप में आज भी अल्मोड़ा के चनौदा आश्रम में प्रतिवर्ष मनाया जाता है।