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बीमार को बचाने के लिए ग्रामीणों ने दांव पर लगाया अपना जीवन

Sat, 28 Jul 2018 10:04 PM IST
भक्त दर्शन पांडेय/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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उमचियां के युवाओं ने बीमार ग्रामीण को पीठ पर लादकर इस तरह पहुंचाया अस्पताल - फोटो : अमर उजाला
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आपदा ने धारचूला तहसील के तीजम गांव को अलग-थलग कर दिया है। ग्रामीणों की आवाजाही के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग तक नहीं है। शुक्रवार को एक बीमार ग्रामीण को बचाने के लिए गांव के दस युवा अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर सड़क तक पहुंचे।

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एक माह पहले आई आपदा से धारचूला के तीजम क्षेत्र को जोड़ने वाला मार्ग पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। अब तक मार्ग खोलने को लेकर कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। गांव केे लोग जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे हैं। शुक्रवार को गांव के केशर सिंह की आंत फट गई। दर्द से छटपटाते केशर सिंह को बचाने के लिए 50 किमी दूर धारचूला के अस्पताल पहुंचाने की चुनौती ग्रामीणों के सामने थी। केशर सिंह को पहले ग्रामीण डोली पर बैठाकर धारचूला को रवाना हुए। आगे चलकर मार्ग इतना खराब था कि डोली के साथ निकल पाना मुश्किल था।

ऊपर से लगातार गिर रहे पत्थर एवं मलबा और नीचे गहरी खाई के कारण बीमार को सुरक्षित पार पहुंचाना बेहद कठिन था। इसके बावजूद अनिल बिष्ट, मोहन बिष्ट, अनिल ग्वाल, संतोष ग्वाल, रविंद्र रूवाल, राजेंद्र सिंह, देवेंद्र सिंह, कृष्ण सिंह, लाल सिंह, ज्ञान सिंह ने बेलचे और फावड़ों से एक आदमी के चलने के लायक रास्ता बनाया। इसके बाद बीमार केशर सिंह को पीठ पर लादकर ग्रामीण एक दूसरे को सहारा देते हुए आगे बढ़े। आखिरकार यह युवा बीमार को सात किमी तक डोली और पीठ पर रखकर सड़क तक सुरक्षित पहुंचाने में सफल रहे। केशर सिंह को धारचूला अस्पताल पहुंचाया गया। जहां पर उनकी गंभीर हालत को देखते हुए जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। शनिवार को जिला अस्पताल में केशर सिंह का ऑपरेशन किया गया, जहां पर उनकी हालत स्थिर बनी है।
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आदम युग में जीते हैं उमचिया के लोग
पिथौरागढ़। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल बिष्ट ने बताया कि सीमांत धारचूला तहसील के उमचिया गांव में तीन सौ परिवार रहते हैं। गांव में अब तक संचार की सुविधा नहीं है। यहां तक कि नेपाली सिम भी यहां काम नहीं करते हैं। किसी परिजन से बातचीत करने के लिए 50 किमी दूर धारचूला जाना पड़ता है। गांव की बिजली भी दस दिन से गुल है। मार्ग नहीं होने से बच्चे, बूढ़े और महिलाएं घरों में कैद होकर रह गए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि एक माह दस दिन के बाद भी शासन-प्रशासन ने सुध नहीं ली है।

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