कुटी गांव से तीन दिन पैदल चलकर धारचूला पहुंची राधिका देवी
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माइग्रेशन पर गए सीमांत के लोगों ने सरकार से हेलीकॉप्टर की मदद मिलने की उम्मीद छोड़ दी है। मार्ग के खतरनाक होने के बावजूद लोगों ने घाटी की ओर वापसी शुरू कर दी है। लगातार तीन दिन तक चलकर दो वृद्धाएं कुटी से शुक्रवार को धारचूला पहुंचीं।
धारचूला में रहने वाले सैकड़ों परिवार अप्रैल में बर्फ पिघलने के बाद व्यास घाटी के बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नावि, रांगकांग, कुटी जाते हैं। वहां पर छह माह तक कृषि कार्य करने के बाद अक्तूबर प्रथम सप्ताह तक वापसी शुरू कर देते हैं। इस साल पूजा होने से माइग्रेशन पर जाने वाले ग्रामीणों की संख्या अधिक रही। उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी शुरू होने और चीन सीमा के लिए निर्माणाधीन सड़क के कारण मार्ग ध्वस्त होने से पैदल मार्ग आवाजाही के लायक नहीं है। मांग करने के बावजूद शासन से हेली सेवा नहीं मिलने के बाद लोगों ने खतरनाक मार्गों से ही लौटना शुरू कर दिया है।
अंतिम गांव कुटी से 77 साल की राधिका देवी अपनी 75 वर्षीय बहन शकुंतला देवी के साथ धारचूला पहुंचीं। इन बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि उन्हें यहां पहुंचने में तीन दिन का समय लगा है। मार्ग खराब होने से हर जगह दुर्घटना का खतरा बना है। महिलाओं के अनुसार अन्य लोग भी जान जोखिम में डालकर लौटने लगे हैं।
उधर, कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष डूंगर सिंह दानू का कहना है कि सरकार सीमांत के लोगों की उपेक्षा कर रही है। माइग्रेशन वाले गांवों को जाने वाला रास्ता जोखिम भरा है। पूजा के लिए गए बुजुर्ग गांवों में फंसे हैं। सरकार को हेलीकॉप्टर शीघ्र भेजना चाहिए।