व्यास घाटी के गांवों में मुख्य बडानी पूजा का समापन हो गया है। अब अगले सात दिनों तक घरों में शगुन के कार्यक्रम चलेंगे। बडानी पूजा में भाग लेने के लिए व्यास घाटी के बूंदी, गर्ब्यांग और नेपाल के छांगरू गांवों में हजारों की संख्या में लोग पहुंचे हैं। धारचूला से भी करीब एक हजार लोग बडानी पूजा में गए हुए हैं। इस कारण नगर में सुनसानी का आलम है।
बडानी पूजा भाद्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को होती है। इस दिन परिवार के सबसे प्रथम पुत्र को लोग नमज्युं मंदिर में ले गए। ऐसा कहा जाता है कि जिस तरह सनातन धर्म में बच्चों को जनेऊ संस्कार जरूरी होता है ठीक उसी तरह शौका जनजातियों में बडानी संस्कार किया जाना जरूरी है। बडानी पूजा के लिए पहले चौंफू के जंगल से देवदार का एक पेड़ लाया गया। इसे दर्च्यो कहा जाता है। इसे ध्वजा, पताका से सजाकर नमज्युं मंदिर में अर्पित किया गया। इस पेड़ को नमज्युं देवता की छड़ी माना जाता है। मंदिर में दर्च्यो चढ़ाने के बाद प्रसाद बनाया गया। दूध और आटे से बनने वाले प्रसाद को दलंग कहते हैं। बालिकाएं अपने भाइयों के साथ मंदिर पहुंची। उन्होंने शगुन के रूप में तीस्या को अर्पित किया।
नमज्युं मंदिर में पूजा अर्चना संपन्न होने के बाद अब लोग घरों को आ गए हैं। घरों में शगुन की परंपरा झुम्को शुरू हो गई है। यह सात दिन तक चलेगी। बडानी पूजा के देवडांगर आनंद सिंह गर्ब्याल, कृष्ण सिंह गर्ब्याल और धीरेंद्र बुदियाल ने कहा कि बडानी पूजा में सभी लोगों का शामिल होना जरूरी है। साल में एक बार होने वाली इस पूजा के समय देवडांगर लोगों को आशीर्वाद देते हैं। व्यास घाटी के गांवों में इन दिनों उल्लास का माहौल है। आस्था और विश्वास का ऐसा मिलन अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।