बंगापानी क्षेत्र के कनार में चौदसी पर होता है इन लोक वाद्यों का इस्तेमाल। संवाद
बंगापानी (पिथौरागढ़)। कनार के मां कोकिला मंदिर में तीन दिसंबर को चौदसी का आयोजन किया जाएगा। क्षेत्र के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक चौदसी में 12 से 15 हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
बरम से लगभग 14-15 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल तय कर कनार पहुंचा जाता है। धारचूला विधानसभा क्षेत्र के अलावा डीडीहाट, पिथौरागढ़ से भी भक्त मंंदिर में दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। मां कोकिला मंदिर में उत्तराखंड का सबसे बड़ा नगाड़ा (वरधनिया दमू) बजाया जाता है जो आकर्षण का केंद्र होता है। धारचूला और मुनस्यारी के गांवों से जात के रूप में बड़े-बड़े नगाड़े (गर्खा) लेकर श्रद्धालु आते हैं। रात भर गर्खा आते रहते हैं जिन्हें मंंदिर की परिक्रमा कर एक सुनिश्चित जगह पर बैठाया जाता है।
रात में भजन-कीर्तन के साथ झोड़ा गाए जाते हैं जिनके माध्यम से देवताओं की लीला का बखान किया जाता है। देवडांगर अवतरित होकर आशीर्वाद देते हैं। यह क्रम सुबह तक चलता है। सुबह कोकिला मैय्या अवतरित होती हैं और तांबे या पंचधातु की बनी डोली पर सवार होकर निकलती हैं। मंदिर से लगभग 200 मीटर दूर तक डोली जाती है जहां माता वरदान देती हैं।
वहां से अन्य देवडांगरों व श्रद्धालुओं के साथ माता कोकिला भी नंगे पैर 7-8 किलोमीटर पैदल चलकर छिपलाकेदार की चोटी तक जाती हैं। वहां पर भकौर, शंखनाद से देवडांगर अवतरित होते हैं। इस दौरान सूखे पहाड़ से एक मिनट के लिए वरपानी निकलता है जिसमें दूध, पानी मिलाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसको मरौल जाना भी कहते हैं। आयोजन को लेकर क्षेत्रवासी में काफी उत्साह है।