बौराणी के सैम मंदिर में मशाल लेकर जाते श्रद्धालु
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इस बार भी बौराणी की ऐतिहासिक मशाल मेले का मुख्य आकर्षण थी। शनिवार रात बारह बजे पुलईचापड़ गांव से लाई गई छिलके (चीड़ के पेड़ के ज्वलनशील भाग की लकड़ी) की 30 फुट लंबी मशाल की सैम मंदिर में परिक्रमा शुरू हुई। लोगों का हुजूम जयकारे के साथ इसके स्वागत के लिए उमड़ पड़ा। स्थानीय बोली में इसे रांखा कहते हैं।
मेले में पहुंचे 80 वर्षीय बुजुर्ग धनसिंह बोरा ने बताया कि मेले में मशाल लाने की परंपरा सदियों पुरानी है। वह बचपन से इस परंपरा के साक्षी हैं। उन्होंने बताया कि यह स्थानीय लोगों के लिए सुख, समृद्धि एवं खुशहाली का प्रतीक है। प्रत्येक मेलार्थी इसके दर्शन अवश्य करता है। इस बार भी मशाल को मंदिर की सात परिक्रमा के बाद मंदिर प्रांगण में गाड़ दिया गया। मशाल की परिक्रमा के दौरान मुख्य मंच के कार्यक्रम रोक दिए गए थे।
मंदिर परिसर में देवताओं का अवतरण हुआ
बौराणी मंदिर परिसर में झोड़ा, चांचरी और देवताओं के अवतरण का आयोजन हुआ। मशाल को मंदिर परिसर में गाड़े जाने के बाद यहां देवताओं के अवतरण के लिए नौर्त शुरू हुआ। देव डांगरों ने सैम देवता का आह्वान किया तो लोगों का हुजूम मंदिर परिसर में उमड़ पड़ा। अखंड धूनी में देव डांगर मोहन सिंह, गुलाब राम, फकीर राम, जीत राम आदि ने नौर्त के माध्यम से श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। बौराणी मेले में देवताओं के अवतरण का भी खास महत्व है।