मात्र सड़क से ही पलायन रोकने की पहल परवान चढ़ती नहीं दिख रही। जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर सातशिलिंग-थल मोटर से लगे उसैल गांव में सड़क से जुड़ने के बाद पलायन की मार पड़ी है। सड़क बनने से पहले गांव में 65 परिवार रहते थे। अब 30 रहते हैं। बेहतर सुविधाओं के लिए लोग अपने पुरखों की थाती को छोड़कर पिथौरागढ़, हल्द्वानी, देहरादून, दिल्ली शहरों में बस गए।
जिला मुख्यालय के नजदीक सातशिलिंग से थल के लिए सड़क का निर्माण वर्ष 1983 में हुआ। उसैल के लोग बताते हैं कि सड़क बनने से पहले गांव के बालकृष्ण पांडे के परिवार ने पलायन किया था। सड़क बनने के बाद अन्य असुविधाएं गांव के लोगों को कचोटने लगी। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए लोग गांव छोड़ने लगे। हरगोविंद पांडेय, प्रकाश पांडेय, कांति बल्लभ पांडेय, मोहन पांडेय, प्रकाश पांडेय, पूरन पांडेय समेत 35 परिवार अब तक पलायन कर चुके हैं।
गांव के गंगा दत्त पांडेय, प्रयाग दत्त पांडेय, जिला पंचायत सदस्य जगदीश कुमार कहते हैं कि गांव को खाली होते देख मन को पीड़ा पहुंचती है। जो लोग गांव से जा रहे हैं, वह भी खुश होकर नहीं जाते। अपने पुरखों की मिट्टी को छोड़ते समय उन लोगों की आंखों में भी आंसू होते हैं। बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध न होने से गांव खाली हो रहे हैं। इन हालात में पलायन रोकने की बात बेमानी के सिवा और कुछ नहीं लगती।
रही सही कसर सुअर, बंदर पूरी कर रहे
आधे से अधिक खाली हो गए उसैल गांव के लोग कहते हैं कि सरकार मूलभूत सुविधा नहीं दे पा रही है। रहीसही कसर जंगली सुअर और बंदरों ने पूरी कर दी है। सुअर और बंदरों से निजात दिलाने में भी सरकारी तंत्र फेल है।