थल में रामगंगा के किनारे पटा कूड़ा
- फोटो : अमर उजाला
थल में रामगंगा के तट पर स्थित बालेश्वर मंदिर में 13 अप्रैल से बैशाखी का मेला लगेगा। लोग नदी में स्नान के बाद बालेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे, लेकिन नदी के हर कोने पर पट चुकी गंदगी के बीच लोग कैसे स्नान करेंगे, यह बड़ा सवाल है। लोगों की जितनी आस्था बालेश्वर महादेव के प्रति है, उससे कहीं ज्यादा वह रामगंगा को मानते हैं। हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली रामगंगा थल में पहुंचकर प्राचीन शिव मंदिर के कारण ज्यादा महत्व की हो तो जाती है, लेकिन गंदगी से रामगंगा खुद लाचार है। उसका हर कोना गंदगी से पट गया है। अधिकांश घरों के सीवर की निकासी का जरिया रामगंगा ही है। बाजार और घरों से जितना कूड़ा, पॉलिथीन की थैलियां, कपड़ों के टुकड़े, सड़ी गली चीजें आदि निकलती हैं सभी रामगंगा में ही डाली जाती है।
कस्बे में किसी ने भी कूड़ा निस्तारण के लिए पिट तैयार नहीं किया है। कस्बे की आबादी लगातार बढ़ रही है, लेकिन सफाई की व्यवस्था नहीं बन पाई। लोग मजबूरी में सारा कूड़ा उठाकर नदी में डालते जा रहे हैं। इससे बड़ा सवाल यह है कि अब तक कस्बे में स्वच्छता जागरूकता, नदी बचाओ का कोई अभियान नहीं चला। पूरे देश में नदियों को बचाने, प्रदूषण मुक्त करने का हल्ला हो रहा है, स्पर्श गंगा और नमामि गंगे जैसे कई अभियान चल रहे हैं, लेकिन अब तक कम से कम रामगंगा में ऐसा कोई अभियान नहीं चला है।
रामगंगा लगातार प्रदूषित हो रही है। इसका पानी मुंह में डालने योग्य नहीं रह गया है। नदी में स्नान करने पर भी बीमारी का खतरा है। व्यापारियों ने कई बार अपने साधनों से नदी में सफाई अभियान चलाया, लेकिन संसाधनों की कमी से वह ऐसे कार्यक्रमों में निरंतरता नहीं ला सकते। सरकारी स्तर पर नदी की सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चला है।