पिछले 19 सालों में दो बार पूरी तरह से मिट जाने के बाद भी मालपा एक बार फिर से अपने दम पर आबाद हो सकता है। भारत-तिब्बत व्यापार का मुख्य पड़ाव मालपा पहले भी आपदा में पूरी तरह से ध्वस्त होने के दो साल बाद ही आबाद हो गया था। यह भी तब हुआ जब मालपा के जख्मों को भरने में सरकारी तंत्र ने कोई कोशिश नहीं की।
18 अगस्त 1998 की रात मालपा में बादल फटने से 12वें कैलाश यात्री दल के 60 सदस्यों समेत 260 लोग मलबे में दबकर मारे गए। इसके बाद मालपा पड़ाव बंद कर दिया गया। हादसे के बाद सेना ने कम से कम दस दिनों तक हेलीकॉप्टर के जरिए खोजबीन की। मात्र 17 शवों को मलबे से बरामद करने के बाद यह अभियान रोक दिया गया। उस समय भूवैज्ञानिकों की टीम ने मालपा की कमजोर पहाड़ियाें के भविष्य में कभी भी टूटने की आशंका जताई थी। घटना के दो साल बाद ही लोग इस रिपोर्ट में दी गई चेतावनी को भूल गए और वर्ष 2000 में बिना किसी हिचक के जिप्ती निवासी धन सिंह थापा ने मालपा में दुकान खोली। उनकी देखादेखी मालपा में चार दुकानें और खुल गई। 13 अगस्त 2017 की देर रात मालपा फिर उसी तरह के हादसे का शिकार हो गया। इस बार मालपा में मलबे में दबे 16 लोगों का कोई पता नहीं चल पाया है।
अब लोगों का अनुमान है कि मालपा फिर बसेगा। इसकी वजह यह है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग एवं भारत-तिब्बत व्यापार मार्ग पर गाला और बूंदी के ठीक बीच में पड़ने वाले इस स्थान का बड़ा महत्व है। इस स्थान से रोजाना घोड़े वाले, मजदूर, ट्रैकिंग पर जाने वाले, व्यापारी, कैलाश यात्री सफर करते हैं। उनको गाला से बूंदी पहुंचने में रास्ते में न तो कोई दुकान मिलती है और न कोई पड़ाव मिलता है। पूरे 22 किलोमीटर लंबे इस रास्ते के ठीक बीच में पड़ने वाले मालपा में दुकान का होना जरूरी भी हो जाता है।
1998 में हुए हादसे के बाद कई तरह के सवाल उठे थे। मालपा तक आवागमन का कोई साधन नहीं है। बारिश के मौसम में गाला से सिमखोला होते हुए मालपा पहुंचने वाला रास्ता बंद हो जाता है और उसके बीच में पड़ने वाला सिमखोला का पैदल पुल इस बार भी बह गया। मालपा पहुंचने के लिए मांगती से नजंग नाले होते हुए बने दूसरे रास्ते की हालत और ज्यादा खराब है। पूरे 19 साल बाद हुए दूसरे हादसे के समय यही बात सामने आई कि इतने सालों में सरकारी तंत्र एक कदम आगे नहीं खिसका। मालपा में संचार की कोई सुविधा नहीं है। वहां पर कोई नेटवर्क काम नहीं करता।
आबादी वाले इलाकों में डीएसपीटी सेवा
जिलाधिकारी सी रविशंकर ने बताया कि धारचूला से आगे जहां पर संचार की सुविधा नहीं है, वहां पर डिजिटल सेटेलाइट फोन टर्मिनल (डीएसपीटी) से संवाद कायम किया जाता है। मालपा में ज्यादा आबादी नहीं रहती थी। वहां पर कुछ लोगों ने अस्थायी तौर पर दो-चार दुकानें खोली थी, इसी कारण वहां डीएसपीटी स्थापित नहीं था। अब भी यह पता लगाया जा रहा है कि किन स्थानों पर डीएसपीटी लगाए जा सकते हैं।