पिथौरागढ़। देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर अपना बलिदान देने वाले जिले के पूर्व सैनिकों की तस्वीर और उनकी गाथा को आम लोग जान सकेंगे। पूर्व सैनिक संगठन की ओर से इसके लिए विण स्थित कार्यालय भवन में एक कक्ष बनाया रहा है। इस भवन में पूर्व सैनिकों के विश्राम की व्यवस्था भी रहेगी।
पिथौरागढ़ जिला वीर सैनिकों की जन्म भूमि कहा जाता है। अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई हो या फिर आजादी के बाद दुश्मन देशों से अपनी धरती की रक्षा, यहां के जवान हमेशा अग्रिम पंक्ति पर खड़े रहते हैं। तमाम युद्ध और ऑपरेशन में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीरों की तस्वीर लोग देख सकें और उनकी जांबाजी की कहानी पढ़ सकें, इसके लिए पूर्व सैनिक संगठन अनूठी पहल करने जा रहा है।
पूर्व सैनिक संगठन अपने प्रयासों से विण में सम्मान स्थल का निर्माण करा रहा है। इसको बनाने के लिए पूर्व सैनिकों ने इसे ऑपरेशन सम्मान नाम दिया है। इस भवन में बलिदानियों के साथ ही तमाम वीरता पुरस्कार और विशिष्ट पुरस्कार पाने वाले सैन्य अधिकारियों के बारे में भी जानकारी उपलब्ध होगी।
एक क्लिक पर सामने आएगा पूर्व सैनिकों का इतिहास
पूर्व सैनिक संगठन के उपाध्यक्ष मयूख भट्ट का कहना है कि निर्माण कराए जा रहे कक्ष में जानकारी के लिए जनपद के सभी वीरों, बलिदानियों, वीरता पुरस्कार प्राप्त सैनिकों सहित अन्य विशिष्ट पुरस्कार प्राप्त सैनिकों के चित्रों के साथ उनके इतिहास को भी संरक्षित किया जा रहा है। संगठन का कहना है कि इसको डिजिटल रूप में भी संरक्षित किया जाएगा। इसके लिए संगठन का वेब पोर्टल भी बनाया जाएगा। इस पोर्टल पर जनपद के सभी वीरों का इतिहास एक क्लिक पर जाना जा सकेगा। यह आने वाली युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी भी होगा।
शासन-प्रशासन की उपेक्षा के बाद किया ऑपरेशन सम्मान का शुभारंभ
पूर्व सैनिक संगठन के पदाधिकारियों के अनुसार बलिदानी सैनिकों के इतिहास की जानकारी लोगों तक पहुंच सके, इसके लिए एक स्थल निर्माण की मांग लंबे समय से की जा रही थी। उनकी जनप्रतिनिधि, शासन प्रशासन किसी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद सभी पूर्व सैनिकों से सहयोग के लिए ऑपरेशन सम्मान चलाया गया। अब कक्ष लगभग बनकर तैयार है। शीघ्र ही इसका भव्य शुभारंभ किया जाएगा। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि शहीदों के नाम पर प्रवेश द्वार बनाने के लिए भी बार-बार अनुरोध करना पड़ रहा है। देश की रक्षा के लिए बलिदान होने वाले वीरों के कई गांव आज भी उपेक्षित हैं।