पिथौरागढ़। कभी कृषि उपकरणों और लोहे-तांबे के बर्तनों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध मोस्टमानू मेले का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेले में आस्था की भीड़ बढ़ रही है तो कृषि उपकरण और पारंपरिक बर्तन पूरी तरह गायब हो चुके हैं। कृषि उपकरण तैयार करने के लिए न कारीगर हैं और ना ही खरीदार।
पूर्व में मोस्टमानू मेला आस्था का केंद्र होने के साथ ही व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। मेले की विशिष्ट पहचान लकड़ी के हल, मै, कुदाल आदि कृषि उपकरणों के साथ ही पारंपरिक रूप से तैयार लोहे और तांबे के बर्तन थे। हर आकार की लकड़ी की ठेकी, मठ्ठा तैयार करने वाला पारंपरिक बर्तन लकड़ी का बिंडा, लोहे की कड़ाही, तांबे की परात, गगरी, फूले मेले में खूब बिकते थे। लोहाघाट, चंपावत, अल्मोड़ा के साथ ही देश के अन्य राज्यों से भी कारोबारी व्यापार के लिए मेले में पहुंचते थे। वर्तमान दौर में मेले से ये पारंपरिक कृषि उपकरण और बर्तन पूरी तरह गायब हो चुके हैं। मंदिर के पुजारी नारायण कांडपाल ने बताया कि अब इन पारंपरिक उपकरणों को तैयार करने वाले कारीगर नहीं हैं और ना ही खरीदार। आधुनिकता में ये उपकरण गायब हो गए हैं और इस मेले का व्यापारिक स्वरूप पूरी तरह फीका पड़ चुका है हालांकि लोगों की आस्था में कमी नहीं आई है जो सुखद है।
अच्छी फसल का प्रतीक है मोस्टमानू मेला
पिथौरागढ़। मान्यताओं के अनुसार, मोस्टा देवता बारिश के देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि मोस्टा देवता की आराधना से सूखे से निजात मिलती है और अच्छी बारिश होने से फसल बेहतर होती है। यह मान्यता और आस्था आज भी जीवंत है।