पिथौरागढ़। कोरोना से बचाव के लिए घोषित देशव्यापी लॉकडाउन से इस बार उच्च हिमालयी गांवों में प्रवास की राहें अभी आसान नहीं हैं। लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने के बाद ही सीमांत के लोग अपने मूल गांवों में प्रवास कर पाएंगे।
उच्च हिमालयी क्षेत्र मुनस्यारी, धारचूला के करीब 10 हजार लोग हर साल 15 अप्रैल के बाद अपने मूल गांवों में जाना शुरू करते हैं। मुनस्यारी के 13 गांव मिलम, बुर्फू, रिलकोट, लास्पा, मर्तोली, खिलांच, टोला, मापा, गनघर, बिल्जू, ल्वा, रालम के करीब चार हजार लोग अपने पशुओं के साथ गांवों में प्रवास को जाते हैं। यह लोग गांवों में जंबू, गंधरायण, आलू आदि का उत्पादन करते हैं। धारचूला के व्यास घाटी के सात गांव बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाबी, रौंगकोंग के करीब 350 परिवार प्रवास पर जाते हैं।
दारमा घाटी के सेला, चल, नागलिंग, बालिंग, दुग्तू, सौन, दांतू, बोन, फिलम, गो, ढाकर, तिदांग, मार्छा, सीपू के करीब 90 परिवारों के लोग गांवों में जाकर पल्थी, फांफर, मूली, गोभी, मटर आदि की खेती करते हैं। जाड़ा शुरू होते ही सितंबर आखिर में यह लोग ऊपरी गांवों से नीचे घाटियों में आना शुरू करते हैं। इस बार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में काफी बर्फबारी हुई है। व्यास घाटी में तो स्थिति ठीक बताई जा रही है लेकिन दारमा वैली में सड़क, रास्ते बर्फ से बंद हैं। क्षतिग्रस्त रास्तों को भी ठीक करने के लिए अभी कुछ नहीं किया जा सका है। व्यास घाटी के नाबी गांव की प्रधान सनम नबियाल ने प्रशासन से प्रवास पर गांव जाने की अनुमति देने के लिए प्रशासन को ज्ञापन सौंप अनुमति मांगी हैं।
लॉकडाउन खत्म होने के बाद ही लोग अपने मूल गांवों में प्रवास पर जा सकते हैं। अभी जो जहां है वहीं बना रहेगा। - डॉ. विजय कुमार जोगदंडे, डीएम, पिथौरागढ़।