महाकाली मंदिर में स्थापित शक्तिपीठ
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श्री महाकाली मंदिर में इन दिनों सहस्त्रचंडी महायज्ञ किया जा रहा है। महायज्ञ में प्रतिदिन 108 ब्राह्मण देवी का पाठ कर रहे है। यज्ञ के पांचवें दिन अरण्य मंथन से ब्राह्मणों द्वारा अग्नि उत्पन्न कर हवनकुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित की गई। सहस्त्रचंडी यज्ञ में अग्नि प्रज्ज्वलित कर हवनकुंड में हवन किया जाता है। हवनकुंड में अब प्रतिदिन पाठ आदि के बाद महाकाली के निमित्त घी, तिल, नारियल आदि की आहुति देकर यज्ञ किया जाएगा। अंतिम दिवस 24 मई को महायज्ञ होगा। सहस्त्रचंडी यज्ञ में क्षेत्र, राज्य, देश की सुख और समृद्धि की कामना की जा रही है।
श्री महाकाली मंदिर में कई वर्षों बाद सहस्त्रचंडी यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इससे पूर्व केंद्र की भाजपा सरकार में मानव संसाधन मंत्री रहे मुरली मनोहर जोशी ने वाराणसी के पंडित बुलाकर हवनात्मक और महंत शंकर गिरी महाराज ने पाठात्मक सहस्त्रचंडी यज्ञ का आयोजन किया था। महाकाली दरबार में लगने वाला सहस्त्रचंडी यज्ञ सबसे बड़ा यज्ञ माना जाता है। महायज्ञ के चलते मंदिर में रौनक बनी है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ, बनारस समेत देश-विदेश से श्रद्धालु माता के दर्शन को यहां पहुंच रहे है। मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी है। रोजाना सायंकाल भंडारे का आयोजन किया जा रहा है, इसमें हजारों लोग भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। इससे पहले रोजाना सुबह महाकाली को भोग लगाया जाता है। रात में महाआरती के बाद माता के दरबार के किवाड़ बंद कर दिए जाते है। सहस्त्रचंडी यज्ञ के दौरान महाकाली मंदिर के अलावा आसपास के मंदिरों चामुंडा, छिमाल, वैष्णवी देवी समेत आसपास के सभी मंदिरों में भी रोजाना एक-एक पंडित पाठ कर रहे हैं। इन मंदिरों में जाने वाले ब्राह्मण सुबह पहले महाकाली मंदिर में जप आदि करते हैं। सहस्त्रचंडी यज्ञ में एक हजार से अधिक पाठ किए जाते हैं।
महाकाली शक्तिपीठ में सहस्त्रचंडी महायज्ञ के दौरान कोई भी ब्राह्मण मंदिर परिसर से बाहर नहीं जा सकता है। महायज्ञ के दौरान अंतिम दिन तक उन्हें मंदिर में ही रहना होता है। रात में रोजाना सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर में भजन-कीर्तन कर रहे हैं। लाउड स्पीकरों के माध्यम से पूरे क्षेत्र का वातावरण महाकाली के यज्ञ के वेद मंत्रों से गुंजायमान हो रहा है। महायज्ञ में हवनकुंड में किया जाने वाला हवन अरण्य मंथन से उत्पन्न की गई अग्नि से ही किया जाता है। आधुनिक तौर-तरीके से हवन कुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित करने का नियम नहीं है। अरण्य मंथन करीब एक घंटे तक किया जाता रहा। इसे लकड़ी से बने अरण्य को मठ्ठा बनाने की विधि की तरह लकड़ी पर मथा जाता है। जब उससे चिंगारी उठने लगती है तब दीप आदि जलाकर उस अग्नि से हवनकुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है।