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आठ तालाब बनाए निजी भूमि पर, एक हवा में

Tue, 15 Sep 2015 04:46 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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उत्तराखंड विकेंद्रीकृत ग्रामीण जलागम विकास परियोजना के फेज-टू में लाखों रुपये के घपले की बू आ रही है। गांवों में सिंचाई साधन उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक भूमि पर नौ तालाब बनाए जाने थे, जिनमें आठ तालाब निजी भूमि पर बना दिए गए और एक का भुगतान तो हो गया, लेकिन धरातल पर कहीं नहीं बना। निजी भूमि पर बने दो तालाबों पर कब्जा हो गया है, एक क्षतिग्रस्त हो गया है और शेष पर भी कब्जा होने वाला है। योजना के तहत 43 करोड़, 56 लाख, 36080 रुपये जारी हुए थे। 2021 तक चलने वाली यह योजना एक साल में ही दम तोड़ती नजर आ रही है।
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परियोजना से डीडीहाट, मुनस्यारी, बेड़ीनाग विकासखंड के रामगंगा घाटी से जुड़े 63 गांवों में जल संवर्धन, चालखाल, निर्माण, वनीकरण, खड़ंजे, तालाब निर्माण, पशुपालन को बढ़ावा देने के साथ ही फल, सब्जी उत्पादन का काम किया जाना है। ट्रेनिंग मद में परियोजना के लिए अलग से दो करोड़ का बजट मिला था। नाचनी यूनिट के नाचनी, बोरागांव, धामीफल्याटी, चामीभैंसकोट, मुवानी यूनिट के तुर्गोली, दिगौटी, थल यूनिट के तेजम बरसायत में 9 ग्रामीण तालाब बनाए जाने थे। चामी भैंसकोट में तालाब नहीं बना है। धामीफल्यांटी में क्षतिग्रस्त हो गया है। निजी भूमि में बने हैं। प्रावधान नहीं मत्स्य तालाब सार्वजनिक भूमि में बनने थे। निजी भूमि में तालाब बनाने से लेजम गांव में विवाद चल रहा है। बरसायत गांव में भूमि स्वामी ने तालाब पर कब्जा जमा लिया है। 1.94 लाख प्रत्येक की लागत से बनने वाले इन तालाबों का कुल भुगतान 17.46 लाख रुपये मार्च-2015 में यूनिट अधिकारी कर चुका है।
वर्ष 2014 से 2021 तक चलने वाली परियोजना में डीडीहाट विकासखंड के 30, मुनस्यारी के 29, बेड़ीनाग के 4 गांव हैं। तीन यूनिटों में नाचनी यूनिट में 23, थल में 18, मुवानी यूनिट में 22 गांव शामिल हैं। मूल परियोजना से नाचनी के 15, थल के 12, मुवानी के 11 गांवों में वनीकरण, चालखाल, खड़ंजा निर्माण आदि का काम चल रहा है।
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वित्तीय वर्ष 2014-15 में 23.59 लाख, वर्ष 2015-2016 के लिए 43 लाख रुपये की रकम ग्राम पंचायतों के खातों में डाली गई है। पहले फेज में गंगोलीहाट में परियोजना चली थी अब वहां भी जलागम के कार्यों में घपलेबाजी का अंदेशा पैदा हो गया है। जलागम के उप परियोजना निदेशक आरके सिंह कहते है कि यूनिट प्रभारी रमेश कुटियाल ने टंकियों का निर्माण होने के प्रपत्र जमा कर भुगतान लिया है। मानकों के विपरीत काम किया गया होगा तो उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा।


12.54 लाख की लागत से लगे लीची के पौधे सूखे
नाचनी। परियोजना के अधिकारियों ने घपलेबाजी की हदें पार कर दी हैं। ट्रेनिंग मद में फलदार पौधों के रोपण के लिए 12.54 लाख रुपये दिए गए थे। अपने राज्य की तराई को छोड़कर देहरादून की एक नर्सरी के माध्यम से झारखंड से लीची 3500 पौधे मंगाए गए, जो सूख गए हैं। सहायक परियोजना निदेशक आरके सिंह कहते हैं तराई में लीची की पौध उपलब्ध नहीं हुई। देहरादून नर्सरी संचालक के माध्यम से पौधे मंगाए गए। नर्सरी संचालक ने झारखंड से पौधे मंगाए, जो सूख गए हैं, इनके स्थान पर अगले साल फिर पौधे लगाए जाएंगे।


और भी घपले ही घपले
नाचनी। 11 लाख रुपये की लागत से काश्तकारों के वहां पालीहाउस लगाए गए हैं। पालीहाउसों की ऊंचाई मानकों में 9 फीट है, जबकि 8 फीट ऊंचाई के पालीहाउस लगाए गए हैं। पालीहाउसों में गुणवत्ता विहीन पन्नी लगाई गई है। एंगिल भी मानक से पतले हैं। सहायक परियोजना निदेशक कहते हैं कि पालीहाउस मानकों के अनुसार मंगाए हैं। मानकों में नहीं होंगे तो सप्लायर से वसूली होगी।


अपात्रों को दे दी पशुशाला
नाचनी। पशुशाला निर्माण में 26.77 लाख खर्च हुए हैं। एंगिल छत, दरवाजे, खिड़की उपलब्ध कराने के साथ ही 75,000 रुपये निर्बल वर्ग पात्रों को देने थे, लेकिन कई अपात्रों को पशुशाला के लिए धन दे दिया गया है। बर्मी कंपोस्ट पिट मानकों से बड़े बना दिए गए हैं, जबकि छोटे पिट लाभदायक रहते हैं।

परियोजना के तहत किए गए कामों की पूरी पत्रावली तलब की जा रही हैै। यह एक गंभीर मामला है। जांच में घोटाला सामने आया तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई कराई जाएगी।
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- जयभारत सिंह, एसडीएम कालिका
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