वैसे पहाड़ के गांव तो खाली हो रहे हैं लेकिन भागीचौरा को देखकर तो ऐसा लगता है कि आने वाले समय में कस्बे भी वीरान हो जाएंगे। भागीचौरा कस्बा राजनैतिक उपेक्षा का दंश झेल रहा है। कस्बे में अस्पताल तो है पर इसमें छह साल से डाक्टर नहीं है। पानी के लिए कस्बे में हर साल गर्मियों में हाहाकार मचता है।
कस्बे के लिए बनी जौरासी-चौंसाल पेयजल योजना से पानी न मिलने के कारण गर्खा लिफ्ट पेयजल योजना का प्रस्ताव शासन को गया था लेकिन जल निगम ने पेयजल योजना का प्रस्ताव रद्द करा दिया है। कस्बे के लोगों में इस कारण मायूसी का आलम है।
भागीचौरा की आबादी 3500 के करीब है। पसमा, चौंसाल, डुंगरा, बाराकोट, आमकोट गांव के लोग आकर भागीचौरा कस्बे में बस गए। गांवों में भारी असुविधा के कारण लोगों ने कस्बे का रुख किया था लेकिन अब कस्बे में भी वही आफत झेलनी पड़ रही है। भागीचौरा के लिए कोई बस सेवा नहीं है।
लोगों को बस पकड़ने के लिए 20 किलोमीटर दूर ओगला आना पड़ता है। भागीचौरा से गांवों को जोड़ने के लिए जितनी भी सड़कें प्रस्तावित हैं वह सभी अधूरी हालत में हैं।
इन समस्याओं का निदान निकालने लोगों ने ब्लॉक बनाओ संघर्ष समिति का गठन भी किया ताकि ब्लॉक मुख्यालय बनने पर गांवों तक विकास की किरण पहुंच सके लेकिन ब्लाक का सपना कब पूरा होगा, कहा नहीं जा सकता। कस्बे की असुविधाओं के कारण यहां से भी लोग अन्य शहरों को जाने लगे हैं।