पिथौरागढ़। पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों बैठकी होली की धूम है। होल्यार इनमें होली के रसिक वाद्य यंत्रों के साथ धार्मिक और शृंगारिक गीतों का गायन करते हैं। पिथौरागढ़ में बैठकी होली 1930 से शुरू हुई जो आज तक बदस्तूर जारी है।
पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. अशोक पंत बताते हैं कि यहां होली की शुरूआत करने वाले कीर्ति बल्लभ जोशी, आरसी पांडे, नर सिंह मटियानी, सुंदर सिंह मटियानी, गोपाल दत्त पांडे, सनातन पाटनी, राम दत्त पांडे आदि के नाम मुख्य हैं। उस दौर में उस्ताद बुलाकीराम, उस्ताद इन्तिया राम शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देते थे।
बैठकी होली का मूल गंगोलीहाट क्षेत्र को माना जाता है। प्रसिद्ध कुमाऊंनी कवि गुमानी राम ने भी बैठकी होली बंदिशों की रचना की जो आज भी गाई जाती हैं। गंगोलीहाट से बांस, गौरंगदेश होते हुए होली की बैठकें पिथौरागढ़ पहुंची। बैठकी होली में पीलू, कल्याण, यमन, काफी, जंगला, शहाना, खमाज, दरबारी, बागेश्री, भूपाली, दुर्गा, झिंझोटी, जैजैवंती, परज, जोगिया, भैरवी आदि रागों में परंपरा से बने हुए गीत गाए जाते हैं।
वह बताते हैं कि 1990 से पिथौरागढ़ के लिए बैठकी होली का स्वर्णिम काल रहा। बैठकी होली पौष माह के प्रथम रविवार से प्रारंभ होती है और होली की छलड़ी तक इनका आयोजन होता है। परंपरानुसार प्रारंभ में स्तुति की विष्णुपदी होलियां वसंत पंचमी से, शिवरात्रि से संयोग एवं वियोग शृंगार की होलियां और होलिकाष्टमी से धूम (रंग) की होलियां गाई जाती हैं।
यह परंपरा आज भी निभाई जाती है। लोक संस्कृति के जानकार पूर्व प्रधानाचार्य पदमा दत्त पंत बताते है कि बैठकी होली गायन में एक व्यक्ति गाता है और अन्य लोग श्रोता बने रहते हैं।
एकादशी से शुरू होती है खड़ी होली
फागुन शुक्ल पक्ष की एकादशी से खड़ी होली शुरू होती हैं। गांवों में इस दिन परंपरागत से चीर बंधन किया जाता है। टीका लगाने के बाद ढोल की थापा पर होली गीत गाए जाते हैं। गंगोलीहाट के हाट कालिका मंदिर और पिथौरागढ़ नगर के चौक बाजार में चीर बंधन एकादशी से तीन दिन पूर्व होलिकाष्टमी तिथि को करने की परंपरा है।