पिथौरागढ़। उत्तराखंड राज्य बनने से पहले पहाड़ी इलाकों की पहचान खेती-किसानी से थी। गांवों के खेत अनाज से भर जाते थे। लोग सालभर का अनाज घरों में सुरक्षित रखते और जरूरत पड़ने पर बेच भी देते थे। पिछले ढाई दशक में हालात काफी बदल गए हैं। पहाड़ की खेती लगातार कमजोर हो रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं।
वर्ष 2001-02 में कुमाऊं के छह जिलों में कुल 3,78,854 हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। कृषि विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अब यह घटकर 2,75,092 हेक्टेयर रह गई है। यानी एक लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा जमीन खेती के दायरे से बाहर हो चुकी है। सबसे ज्यादा गिरावट अल्मोड़ा जिले में देखी गई है।
सरकार की ओर से किसान सम्मान निधि, क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा जैसी योजनाओं के बावजूद खेती का दायरा सिकुड़ रहा है। पहाड़ों में छोटी-छोटी जोत, लगातार पलायन, जंगलों से आने वाले वन्य जीवों का खतरा और सिंचाई के पानी की कमी के चलते काश्तकार खेती से विमुख होते जा रहे हैं।
पिथौरागढ़ जिले की तस्वीर
-जिले में 73,744 किसान पंजीकृत हैं।
-इनमें से 30,000 किसानों के KCC बन चुके हैं।
-64,000 किसान सम्मान निधि का लाभ ले रहे हैं और कई नए किसान आवेदन कर रहे हैं।
कोट
खेती को बढ़ावा देने के लिए किसान सम्मान निधि, किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा, अनुदान पर खेती में लगने वाले निवेश मुहैया कराए जाते हैं। कृषि विभाग की ओर से किसानों को खेती के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है। - अमरेंद्र चौधरी, मुख्य कृषि अधिकारी
कुमाऊं में कहां-कितनी गिरावट आई? (शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल - हेक्टेयर में)
जनपद वर्ष 2001-02 वर्ष 2023-24
अल्मोड़ा 81,333 46,704
बागेश्वर 24,773 18,926
चंपावत 27,186 10,861
पिथौरागढ़ 45,801 29,740
नैनीताल 99,232 72,144
ऊधमसिंह नगर 1,50,145 1,32,789