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अब हम अपुण दाद कैथे कुंन

Sun, 28 Oct 2018 12:17 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, पिथौरागढ़
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बडेना गांव में रोते बिलखते शहीद राजेंद्र सिंह के परिजन। - फोटो : अमर उजाला
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पत्थरबाजों ने तीन बहनों से उनका इकलौता भाई छीन लिया। शहीद राजेंद्र का पार्थिव शरीर बडेेना पहुंचा तो तीनों बहनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। तीनों बहनों का यही कहना था कि अब हम अपुण दाद कैथे कुंन (अब हम अपना भाई किसको कहेंगे)।
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शनिवार को राजेंद्र का पार्थिव शरीर पहुंचने से पहले वह बार-बार यही दोहरा रही थीं कि यो चारपाइ भार किला राखि राखो, मेरो ददा आलो त भितर बैठोलो (ये चारपाई बाहर क्यों रखी है, मेरा भाई आएगा तो बाहर नहीं भीतर बैठेगा)। उनको रोता देख अन्य महिलाएं भी रो पड़ीं। चार भाई-बहनों में राजेंद्र अकेला भाई था। राजेंद्र की बड़ी बहन रेखा देवी का विवाह हो चुका है, जबकि सीमा और पूजा पढ़ाई कर रही हैं। जब से उन्हें भाई के शहीद होने की सूचना मिली तीनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। शहीद के पिता यह दुखद समाचार सुनने के बाद से गुमसुम हैं। शनिवार को जब बेटे का पार्थिव शरीर घर के आंगन में पहुंचा तो वह गुमसुम ही रहे। हालांकि, शहीद की मां मोहनी देवी ने रोते-रोते भी हिम्मत दिखाई और सबको ढांढस बंधाया।


नया घर बना रहा था राजेंद्र
गंगोलीहाट। गरीबी में दिन बिताने के बाद फौज में भर्ती हुआ राजेंद्र गांव में ही नया घर बना रहा था। दीपावली पर राजेंद्र भी घर आने वाला था। दीपावली में ही नए घर में प्रवेश करने की योजना थी। ग्रामीणों ने बताया कि पूरा परिवार इसके लिए योजना बना रहा था। बहनों की इच्छा थी कि वह इस बार विशेष रूप से घर में सजावट करेंगी, लेकिन दीपावली से पहले ही उसका पार्थिव शरीर तिरंगे पर लिपटकर घर आने से पूरे परिवार के सपनों पर ग्रहण लग गया। घर की तरह ही उनके सपने भी अधूरे रह गए।
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बचपन से ही सेना में भर्ती होना चाहता था राजेंद्र
गंगोलीहाट। जम्मू कश्मीर में देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाला राजेंद्र बचपन से ही सेना में भर्ती होना चाहता था। इसके लिए उसने हाईस्कूल से ही तैयारी शुरू कर दी थी। उसके सहपाठियों ने बताया कि राजेंद्र बहुत मेहनती था। परिवार की सीमित आय होने के कारण बचपन से लेकर इंटर पास करने तक जरूरत होने पर भी इच्छाएं दबानी पड़ती थी। परिवार की माली हालत में सुधार आए, इसके लिए वह सेना में ही भर्ती होने की बात कहा करता था। राजेंद्र का जुनून ही था कि दूसरे प्रयास में ही वर्ष 2015 में उसे सेना में भर्ती होने में सफलता मिल गई।
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