घराटों का प्रचलन क्या खत्म हुआ कि पहलवान के नाम से प्रसिद्ध कनौरा (चौना) के सर्वजीत सिंह के रोजगार का जरिया भी चला गया। कभी अकेले ही 150 से 200 किलो वजनी घराट (पनचक्की) के पाटों को अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, धारचूला आदि क्षेत्रों में पहुंचाने के लिए सर्वजीत को 80 रुपये मिलते थे। अकेले घराट के दो पाटों को ढोने की क्षमता के कारण 70-80 के दशक में तहसील के कनौरा निवासी सर्वजीत सिंह की इलाके में ही नहीं, डीडीहाट, धारचूला, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा तक ख्याति थी।
79 वर्षीय सर्वजीत सिंह के मुताबिक उन्होंने वर्ष 1970 से 1985 तक सामान ढोने का काम किया। डीडीहाट, धारचूला, पिथौरागढ़, अल्मोेड़ा तक घराट पैदल ही पहुंचाते थे। 80 के दशक में घराट के दो पाटों को पिथौरागढ़ तक पहुंचाने के 80 रुपये मिलते थे। इस काम में आठ लोग लगे होते थे। वह अकेले ही घराट ले जाते थे, उन्हें भी 80 रुपये मिलते थे। इससे परिवार का खर्च आराम से चल जाता था।
उम्र बढ़ने के साथ ही सर्वजीत अब लाचार हो गए हैं। उनके तीन बेटे बेरोजगार हैं। खेतीबाड़ी कर गुजारा करते हैं। 71 वर्षीय पत्नी जयंती देवी बीमार हैं। दो साल पहले से सर्वजीत सिंह को एक हजार रुपये मासिक वृद्धावस्था पेंशन मिलती है।
सर्वजीत सिंह की मदद की जाएगी। उनको मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से आर्थिक सहायता दिलाई जाएगी। उनके बेटों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाकर रोजगार दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
-मीना गंगोला, विधायक गंगोलीहाट