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एक करोड़ से बने आवासीय भवन में कोई नहीं रहता

Mon, 20 Mar 2017 10:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल
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थल में वीरान पड़ा जीआईसी का आवासीय भवन - फोटो : अमर उजाला
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राजकीय इंटर कॉलेज के स्टाफ को आवासीय सुविधा देने के लिए 1983 में एक करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया भवन अब रहने लायक नहीं है। 52 कमरों के इस भवन के हर कमरे के लकड़ी के दरवाजे और खिड़कियों को दीमक ने खराब कर दिया है। 2011 के बाद कोई कर्मचारी और शिक्षक इस भवन में नहीं रहता। इसकी वजह यह है कि भवन की छत टपकती है। दरवाजों पर दीमक लगी है। कमरों में लगाया गया सीमेंट उखड़ने लगा है। फर्श का प्लास्टर जगह-जगह टूट गया है।
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विद्यालय के सारे स्टाफ ने एक-एक कर इस भवन में रहना छोड़ दिया। अब सभी कर्मचारी किराए के कमरों में रहते हैं। इतने विशाल आवासीय भवन की दुर्दशा की तरफ अब तक अधिकारियों का ध्यान नहीं गया। प्रधानाचार्य एलडी कापड़ी कहते हैं कि यदि भवन की मरम्मत की जाती है तो इसमें बड़ी रकम खर्च करनी पड़ेगी। वह बताते हैं कि जब छह साल पहले यह भवन जर्जर हालत में पहुंचने लगा तभी से विभाग के उच्चाधिकारियों को मरम्मत के लिए पत्र भेजा गया, लेकिन बजट मंजूर नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि खंडहर हो चुके इस भवन में कोई भी कर्मचारी कैसे रहेगा। 

भवन की मरम्मत को कदम उठाए जाएं
शिक्षक-अभिभावक संघ के अध्यक्ष गिरीश चंद्र उपाध्याय का कहना है कि करोड़ों की संपदा नष्ट हो रही है। इसकी मरम्मत के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। दरवाजों और खिड़कियों की लकड़ी को दीमक से बचाने के लिए लोहे के दरवाजे लगाए जाएं। ऐसा करने से भवन को फिर से उपयोग में लाया जा सकता है। उनका कहना है कि भवन की दुर्दशा के कारण स्टाफ को दिक्कत उठानी पड़ रही है।
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भवन का कोई और उपयोग हो
अभिभावक चंद्रबल्लभ जोशी का कहना है कि यदि भवन का आवासीय उपयोग संभव नहीं है तो इसमें कोई अलग संस्थान खोल दिया जाए। वह सुझाव देते हैं कि इसमें बीज भंडार या चारा भंडार बनाया जा सकता है। कम से कम सरकारी संपत्ति का किसी रूप में तो उपयोग होना चाहिए। भवन की दशा से सभी चिंतित हैं। इस बारे में आवाज उठाई जाएगी। 
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