पिथौरागढ़ (भक्त दर्शन पांडेय)। आजादी के बाद देश में हर क्षेत्र में क्रांति आई लैंडलाइन फोन से लेकर लोग मोबाइल फोन तक आ गए। साइकिल से लेकर एरोप्लेन से लोग सवारी करने लगे। 2जी, 3जी, 4जी से लेकर 5जी नेटवर्क तक देश की संचार कंपनियां उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने लगी लेकिन उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र के कई गांव ऐसे हैं जहां भारतीय संचार सेवा है ही नहीं। मजबूरन लोग नेपाल के सिम के जरिये एक दूसरे से संपर्क करते हैं। भले ही देश की सुरक्षा के लिहाज से यह गलत है पर कर भी क्या सकते हैं। यह तो सिर्फ संचार की बात है आज भी यहां लोग नमक से लेकर तेल तक के लिए 14 मील तक पैदल चलने के लिए मजबूर हैं।
संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने नेपाल सीमा से लगे तड़ीगांव का रुख किया तो इस गांव की कहानी भी सीमा से सटे अन्य गांवों जैसी ही है। ग्रामीणों ने बताया कि चुनाव आने पर नेता वादे और दावों का झुनझुना लेकर आते हैं और मतदाताओं को मतदान के लिए सम्मोहित करके अगले पांच साल तक के लिए गायब हो जाते हैं। पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्र की यह ग्राम पंचायत आठ अलग-अलग गांवों में फैली है। वड्डा से पंथ्यूड़ी रोड से होकर तड़ीगांव जाते समय इस ग्राम पंचायत का पहला गांव जायल पड़ता है। विकास के नाम पर छह माह पहले ही इस तोक तक सड़क पहुंची है।
ज्ञालपीपल, चौड़ी, लामाईजर, बोनकोट, टाकुला, पीपलतड़ा राजस्व गांव इस ग्राम पंचायत का हिस्सा हैं। जायल से पैदल ढलान में कट रही सड़क से 30 मिनट में बोनकोट पहुंची टीम को राजमिस्त्री का काम करने वाले 71 वर्षीय गंगा राम मिले। विकास कार्यों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने दो टूक कहा कि जब 10 साल का था तब भी पैदल वड्डा बाजार जाता था और आज भी उस दूरी को पैदल ही नाम रहा हूं। थोड़ा आगे बढ़ने पर टाकुला तोक में धनी चंद मिले तो उन्होंने बताया कि शिक्षा के नाम पर गांव में केवल जूनियर हाईस्कूल ही हैं, जिसमें दस बच्चे हैं। तड़ीगांव के बच्चे भी हाईस्कूल, इंटर के लिए नौ किलोमीटर दूर गौड़ीहाट जाते हैं। जरूरी सामान लेने के लिए पैदल जाना मजबूरी है।
टूटी नहरें बदहाल खेती की दे रहीं गवाही
पिथौरागढ़। टाकुला से तड़ीगांव के लिए निकले तो एक पुरानी और टूटी सिंचाई नहर दिखी जो यहां की असिंचित खेती की गवाही दे रही थी। उसी नहर की एक फीट चौड़ी दीवार के ऊपर चलते हुए आगे बढ़े तो करीब 45 किमी चलने के बाद तड़ीगांव नजर आया। सीमा के उस पार नेपाल में जहां गांव-गांव सड़कें नजर आ रही थीं, वहीं इस और उबड़-खाबड़ रास्ते कमजोर सियासी इच्छाशक्ति को बया कर रहे थे।
विकास के नाम पर छला गया
पिथौरागढ़। गांव में 22 परिवार रहते हैं लेकिन यहां कुछ ही लोग नजर आए। आंगन में काम कर रहे रमेश चंद ने बताया कि गांव के सभी लोग जाड़ों में खेतों से नीचे एक मैदान में जमा होते हैं और वहीं पर बातें करते हैं। जब हम रमेश की बताई हुई जगह पर पहुंचे तो बच्चे, युवा और बुजुर्ग चौपाल लगाए मिले। परिवार के चार सदस्यों के हाथों में मोबाइल फोन नजर आया। गांव के 85 वर्षीय पदम चंद ने बताया कि विकास के नाम पर आज तक इस गांव के लोगों को छला गया है। उनके पास कोई सुविधा नहीं है। जरूरी सामान के लिए आज से सात दशक पहले भी पैदल ही अड़किनी जाते थे आज भी पैदल ही जा रहे हैं।
सड़क नहीं आई तो विकास कैसे आता
पिथौरागढ़। 77 वर्षीय शिव चंद का कहना था कि सड़क नहीं होने से पूरा गांव पिछड़ा है। असुविधाओं के कारण दर्जनों परिवार यहां से वड्डा, पिथौरागढ़ या फिर अन्य शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। जब इतने सालों तक सड़क ही नहीं बनी तो शिक्षा, चिकित्सा का क्या कहें। चावल, दाल, आटा, नमक, तेल, माचिस भी अड़किनी या वड्डा से ही लानी पड़ती है। यह सामान या तो अपनी पीठ पर या फिर घोड़ों पर लादकर गांव तक पहुंचता है।
अस्पताल जाने के लिए डोली ही विकल्प
पिथौरागढ़। तड़ीगांव से आठ से दस किमी के दायरे में स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं है। बीमार और गर्भवती महिलाओं को डोली में अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। पर समस्या यह है कि बीमारों को 10 से 12 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई में सड़क तक पहुंचाने के लिए लोग नहीं मिल पाते हैं। किसी के बीमार होने पर दवा से लेकर उपचार तक के लिए 25 किमी दूर पिथौरागढ़ जाना पड़ता है। इसमें आधी दूरी पैदल ही नापनी पड़ती है। झूलाघाट तक पहुंचने के लिए भी सड़क नहीं है। जौलजीबी-टनकपुर सड़क भी इसी गांव से होते हुए प्रस्तावित है, लेकिन दो दशकों से कट रही यह सड़क न तो जौलजीबी की ओर से और न ही टनकपुर की ओर से तड़ीगांव तक पहुंच सकी है।
सड़क नहीं होने से उत्पाद को नहीं मिलता बाजार
पिथौरागढ़।काली नदी किनारे बसा तड़ीगांव की जमीन बेहद उपजाऊ है। यहां तराई की तरह फसलों और फलों का उत्पादन होता है, लेकिन सड़क नहीं होने से आम, लीची, अमरूद, केले सड़ जाते हैं। 1982 में करोड़ों की लागत से बनी सिंचाई नहर में आज तक पानी नहीं आया है। गांव के मोहन, गोपाल, दीपक, सुरेश और नवीन ने बताया कि गांव तक सड़क और नहर में पानी आ जाता तो यह क्षेत्र विकसित हो जाता, लेकिन विकास के नाम पर केवल आश्वासन ही मिलते हैं। ग्रामीणों ने कहा कि तीन माह से पानी की लाइन टूटी है। अभी तक सुधार नहीं किया गया है।
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कुछ वर्ष पहले तक काली नदी पार नेपाल के गांवों में बिजली तक नहीं थी, आज हर गांव में सड़कें पहुंच गई हैं लेकिन हम लोगों को आज भी पैदल ही आना-जाना पड़ रहा है। - रोशन चंद, छात्र
हमारा गांव आज भी बेहद पिछड़ा है। विकास और रोजगार जैसे मुद्दों पर वोट डालेेंगे। गांव में प्राइवेट संचार कंपनियों के सिग्नल आते हैं लेकिन बीएसएनएल काम नहीं करता है। नेपाल की संचार कंपनियों के सिग्नल आते हैं।
-गौरव कुमार, प्रकाश