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Pithoragarh News: विधायक ने खींची विकास की लकीर, इंजीनियर बोले- हम नहीं मानते

Sat, 26 Jul 2025 11:01 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
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डीडीहाट विकासखंड के चिटगाल गांव की विधायक निधी से काटी गयी बदहाल सड़क। स्रोत:ग्रामीण
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डीडीहाट (पिथौरागढ़)। चिटगाल और अवस्थी गांव जैसे गांवों को जोड़ने वाली सड़कें अनियोजित विकास का जीता-जागता नमूना बन गई हैं। यहां ग्रामीणों की मांग पर विधायक निधि से सड़कें बन रही हैं लेकिन इतनी जल्द टूट जा रही हैं कि इंजीनियर भी सिर पकड़ बैठे हैं। उनका कहना है कि न तो इनमें तकनीकी मानक हैं, न सर्वे, और न ही भविष्य की कोई योजना।
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ऐसे में विकासखंड डीडीहाट के दर्जनों गांवों में विधायक निधि से बनाई जा रहीं सड़कें विकास कम, दिखावा ज़्यादा साबित हो रही हैं। बिना डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट), बिना सर्वे और बिना तकनीकी मंजूरी के काटी जा रहीं इन सड़कों का भविष्य शुरुआत से ही संदेह के घेरे में होता है। चिटगाल गांव की चार किमी की सड़क जो 2021 में बनी थी, सिर्फ 60 दिन में नाले में तब्दील हो गई। इसी तरह ओगला से अवस्थी गांव की सड़क भी कुछ ही महीनों में टूट-फूट गई। यह हाल केवल चिटगाल और अवस्थी गांव का नहीं बल्कि पूरे पहाड़ी क्षेत्र की एक चिंताजनक तस्वीर है। विधायक निधि से बनी सड़कें ग्रामीणों के लिए दर्द बनकर रह गई हैं।

सवाल
इंजीनियर हैरान, विभाग परेशान
विधायक निधि की सड़कें इंजीनियरों के लिए सिरदर्द बन गई हैं। विभाग इन्हें अपनाने से मना कर रहे हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं कि अनियोजित काम को कैसे स्वीकार कर लें। उनका दावा है कि ये सड़कें न तकनीकी रूप से ठोस हैं, न दीर्घकालिक प्लान से बनी हैं। नियमानुसार, बिना स्वीकृत योजना के बनी सड़कें विभागीय प्रक्रिया में शामिल ही नहीं हो सकतीं। जब तक विभाग इन्हें अपने अधीन नहीं लेता तो डामर और सुधारीकरण की प्रक्रिया भी शुरू नहीं हो सकती। जब निर्माण ही अस्थायी है तो इसका स्थायी समाधान कैसे निकालें?
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सपना

कच्चा मोटर मार्ग कब पक्का होगा
चुनाव नजदीक आते ही हर गांव में जेसीबी गरजने लगती है। ग्रामीणों को सपना दिखाया जाता है। कागजी विकास के साथ ऐसे इलाकों में पहुंचती है धूल, कीचड़ और टूटे हुए सपने। एक किमी सड़क की लागत जहां लगभग 50 लाख रुपये होती है, वहीं विधायक निधि से सड़कें महज कुछ लाख में बन रही हैं। सरकारी अधिकारी इन सड़कों को कच्चा मोटर संपर्क मार्ग कहकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।
सांसत
ग्रामीणों की दोहरी पीड़ा
गांव के लोग सड़कों के निर्माण के लिए बिना किसी मुआवजे के अपनी जमीन दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि सड़क आएगी तो विकास आएगा लेकिन जब ऐसी सड़कें छह महीने में टूट जाती हैं तब उनकी सांसत का कोई अंत नहीं। तब उन्हें समझ आता है कि उन्होंने केवल जमीन नहीं बल्कि अपनी उम्मीदें भी खो दी हैं। ग्रामीण न तो सड़क से लाभ ले पा रहे हैं और ना ही जमीन का कोई मुआवजा पा रहे हैं। कई बार तो वाहनों के लिए सड़क बंद हो जाने के बाद गांव फिर से पैदलयुग में लौट जाता है।

कोट
विधायक निधि से कटने वाली सड़कों का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनकी निर्माण प्रक्रिया वैधानिक ही नहीं है। ऐसी सड़कें बगैर डीपीआर और सर्वे के काटी जाती हैं।
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-आशुतोष, ईई, लोक निर्माण विभाग

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