मुनस्यारी के पातो गांव में लोगों को यारसागंबू के बारे में जानकारी देते विशेषज्ञ।
- फोटो : अमर उजाला
हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान कटारमल और पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज की ओर से यहां पातो गांव में आयोजित कार्यशाला में किसानों को यारसागंबू की उपज लगातार कम होने के कारणों की जानकारी देते हुए बताया गया कि यारसागंबू को खोदने के लिए लोहे से बने उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। लोहे के उपकरणों से यारसागंबू के लारवा को नुकसान पहुंचता है। जिन स्थानों पर व्यापक पैमाने पर लोहे की कुदाल, फावड़े से जमीन की खुदाई की गई थी वहां पर यारसागंबू की उपज कम हो जाती है।
इसके अलावा हिमालयी बुग्यालों में प्लास्टिक का कचरा डालने, ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में ईंधन के लिए पेड़ों का कटान करने, बुग्यालों में टेंट लगाकर रहने से भी यारसागंबू का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। यारसागंबू बनने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया कि यह मोथ नामक तितली के अंडों से तैयार होता है। जब तितली के अंडे परिपक्व होते हैं तो वह विभिन्न चरणों से होकर गुजरते हैं। अंडे जब कीड़े के रूप में बदलते हैं तो वही लारवा का रूप ले लेते हैं। यही यारसागंबू के रूप में सामने आता है। कहा गया कि यारसागंबू बेहतरीन पर्यावरण में ही पैदा होता है।
यदि किसी स्थान पर ज्यादा यारसागंबू पैदा होता है तो यह मानना चाहिए कि वहां का पर्यावरण संतुलन ठीक है। यदि कहीं पर इसमें कमी आ रही है तो इसका सीधा सा अर्थ हुआ कि वहां पर पर्यावरण का असंतुलन होने लगा है। यारसागंबू बेहद संवेदनशील किस्म का लारवा है और इसके लिए अच्छा वातावरण जरूरी है। इस मौके पर पिथौरागढ़ कॉलेज के प्रदीप शर्मा, शोधछात्र नरेंद्र सिंह ने लोगों को तमाम जानकारियां दीं। कार्यशाला में लक्ष्मण सिंह ज्येष्ठा, नरेंद्र दरियाल, बादल सिंह बोनाल, हरीश ढकरियाल, इदय सिंह, चंदन बोनाल, दलीप सिंह दरियाल, जगत सिंह दरियाल आदि मौजूद थे।