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Pithoragarh: पलायन ने उजाड़ दिए खेत और खलिहान, घर हो गए वीरान; पिछले नौ साल में इतना घट गया खेती का रकबा

Thu, 24 Oct 2024 12:23 PM IST
हीरा मेहरा दिनेश अवस्थी, संवाद

सार

पिथौरागढ़ जिले में गांवों से पलायन के चलते खेत बंजर हो रहे हैं। पिछले नौ साल में खरीफ और रबी का कुल रकबा 16476 हे. रकबा घट गया है।
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कनालीछीना विकासखंड के गुड़ौली गांव में बंजर पड़े खेत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पिथौरागढ़ जिले में गांवों से पलायन के चलते खेत बंजर हो रहे हैं। पिछले नौ साल में खरीफ और रबी का कुल रकबा 16476 हे. रकबा घट गया है। वर्ष 2015-16 में जहां 43,776 हेक्टेयर भूमि पर खरीफ की फसल बोई जाती थी, अब वह रकबा घटकर 34,179 हेक्टेयर रह गया है। नौ सालों में खरीफ फसलों के क्षेत्रफल में 9597 और रबी में 6876 हेक्टेयर की कमी आई है। वर्तमान में धान 19,150 और गेहूं 18,350 हेक्टेयर में बोया जा रहा है। विभागीय आंकड़ों पर यकीन करें तो इन नौ सालों में धान के रकबे में 1650 और गेहूं में 7259 हेक्टेयर क्षेत्रफल की कमी आई है।

गांवों से पलायन नहीं रुका और लोगों का रुझान खेती की ओर नहीं बढ़ा तो वह दिन दूर नहीं जब सीमांत के अधिकांश खेत पूरी तरह बंजर हो जाएंगे। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में 43,776 हेक्टेयर भूमि पर खरीफ और 34,618 हेक्टेयर पर रबी की फसल बोई गई। इसमें धान 20,800 और गेहूं 25,609 हेक्टेयर भूमि पर बोया गया।

इस तरह साल दर साल घटता गया रकबा

वर्ष        खरीफ (हे.)       रबी (हे.)

 

2017     42,655           33,515

 

2018     41,897           32,487

2019     41,520           30,472

 

 

2020     40,582           30,065

2021     40,018           30,325

 

 

2022      38,892          30,025

2023      34,312           27,887

 

 

2024      34,179            27,742

गांवों से पलायन और गांव में रह रहे लोगों में खेतीबाड़ी की तरफ रुझान कम होने से कृषि का रकबा घट रहा है। बावजूद इसके काश्तकारों को कृषि के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्हें विभागीय योजनाओं से लाभान्वित किया जा रहा है।

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- अमरेंद्र चौधरी, मुख्य कृषि अधिकारी।

 

 

 

गांव में चकबंदी नहीं होने से खेत बिखरे हुए हैं। वन्य जीव लगातार फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। खेती छोड़कर पलायन करना मजबूरी बन गया।
- नीरज सिंह, सेल सल्ला, पिथौरागढ़।

 

रोजगार के लिए गांव में कोई संसाधन नहीं हैं। रोजगार, बच्चों को पढ़ाने के लिए गांव छोड़कर जो लोग गए हैं उनके खेत बंजर पड़े हैं। जो गांव में रह रहे हैं उन्होंने भी खेती करना कम कर दिया है।

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-मिलाप सिंह, सल्ला, पिथौरागढ़।

लोगों के पलायन के कारण खेत बंजर होते जा रहे हैं। जो लोग खेती कर रहे हैं उनकी मेहनत पर कभी वन्य जीव तो कभी मौसम पानी फेर रहा है।
- ललित मोहन, डीडीहाट।

 

सुख सुविधा के लिए लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जो परिवार पलायन कर गए हैं उनकी जमीन बंजर पड़ चुकी है। सिंचाई की सुविधा न होने, जंगली जानवर, मौसम की मार सहित तमाम कारणों से पहाड़ की खेती कम होती जा रही है।
- केशव दत्त कापड़ी, सतगढ़, कनालीछीना।

चंपावत में भी घट गया रकबा
चंपावत जिले में पिछले छह सालों खरीफ और रबी की फसल का रकबा घटा है। जिला कृषि अधिकारी डी कुमार ने बताया कि वर्ष 2015-16 में खरीब की फसल 14367 हेक्टेयर में होती थी। जो वर्तमान समय में 12410 हेक्टेयर में हो रही है। जबकि रबि की फसल वर्ष 2015-16 में 11825 हेक्टेयर में होती थी। वर्तमान में रबी की फसल 8935 हेक्टेयर में हो रही है।

 

अल्मोड़ा...20 प्रतिशत घट गया खेती का रकबा
कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक जिले में एक दशक पूर्व यहां एक लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी जो अब घटकर 80,000 हेक्टेयर रह गई है। सरकारी तौर पर किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए कई योजनाएं संचालित होने के बावजूद स्थिति सुधर नहीं रही है। जिले में 1,10,000 किसान खेती कर आजीविका चलाते हैं लेकिन वर्तमान में इन किसानों का लगातार खेती से मोहभंग हो रहा है।

किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए कई सरकारी योजनाएं संचालित हैं। इन योजनाओं के सार्थक परिणाम सामने आ रहे हैं।
-विनोद शर्मा, मुख्य कृषि अधिकारी, अल्मोड़ा।

बागेश्वर... धान का रकबा घटा, मडुवे का बढ़ा
बागेश्वर जिले में धान की फसल का रकबा घट रहा है, जबकि मडुवे का रकबा बढ़ रहा है। प्रभारी मुख्य कृषि अधिकारी डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने बताया कि जिले में करीब 24,800 हेक्टेयर जमीन में खेती की जाती है। करीब 22,100 हेक्टेयर में खरीफ और 21,720 हेक्टेयर में रबी की फसल होती है। जिले में पिछले साल धान के रकबे में गिरावट दर्ज की गई है। अन्य वर्षों में जहां 14,500 हेक्टेयर में धान की फसल होती थी, वहीं पिछले साल यह कम होकर 13,500 हो गई। इस दौरान मडुवे का उत्पादन बढ़ा है। पहले मडुवे की खेती 4500 हेक्टेयर में होती थी जो बढ़कर 6000 हेक्टेयर में होने लगी है।

इधर, कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. कमल कुमार पांडेय बताते हैं कि पिछले पांच साल में खेती के रकबे में अधिक कमी नहीं आई है। किसानों ने खेती के ढंग को बदलना शुरू कर दिया है। पारंपरिक गेहूं और धान के स्थान पर अन्य फसलों का उत्पादन हो रहा है। इस दौरान करीब 500 हेक्टेयर के रकबे में ही कमी आई होगी।

 

किसान केशर सिंह, रमेश सिंह, खीम सिंह बोरा आदि बताते हैं कि खेती में कमी का कारण बंदर और जंगली सुअरों से होने वाला नुकसान भी है। जंगली जानवरों से बचने के लिए अब लोग पारंपरिक फसलों की बजाय औषधीय गुणों वाले या अन्य तिलहन जैसी फसल के उत्पादन करने लगे हैं।

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