अनुसंधान केंद्र परिसर में फुदकता नन्हा कस्तूरा मृग
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इस बार का सावन महरूड़ी के कस्तूरा मृग अनुसंधान केंद्र के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया है। यहां एक माह के भीतर दो शावकों की किलकारियां गूंजी हैं। मृगों के कुनबे के विस्तार से केंद्र में खुशी की लहर है।
केंद्र के प्रभारी डा. एलएमएस नयाल ने बताया कि 17 जून को अनन्या नाम की मृग ने मादा शावक को जन्म दिया था। अभी 8 जुलाई को सलोनी ने नर शावक को जन्म दिया है। उन्होंने बताया कि दोनों शावक स्वस्थ हैं। उच्चाधिकारियों के आने के बाद इनका नामकरण किया जाएगा। डा. नयाल ने बताया कि इन्हें मिलाकर केंद्र में मृगों की संख्या कुल 19 हो गई है, जिसमें 9 नर और 10 मादा हैं।
1976 में स्थापित इस अनुसंधान केंद्र में शुरुआत में 9 मृगों को जंगल से पकड़ कर लाया गया था। यहां मृगों की अधिकतम संख्या 25 रही है। नए शावकों की देखभाल की जा रही है। अनुसंधान केंद्र में बाहरी लोगों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। कस्तूरा मृग लोगों को देखकर घबराता है। इस कारण भी खास सावधानी बरती जाती है।
हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है कस्तूरा मृग
उत्तराखंड का राज्य पशु कस्तूरा मृग दस हजार से साढ़े चौदह हजार फीट ऊंचाई के हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है। नर मृग की नाभि में मिलने वाली बेशकीमती कस्तूरी की सुगंध इस दुर्लभ पशु के लिए शुरू से ही मौत की गंध बनी है। 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में कस्तूरा मृगों की घटती संख्या पर चिंता जताई थी तो केंद्रीय आयुर्वेद विज्ञान अनुसंधान परिषद ने महरूड़ी (उत्तराखंड) और कुफरी (हिमाचल प्रदेश) में इन केंद्रों की स्थापना कराई।
विस्तार न होने के हैं कई कारण
यहां एक-दो कारणों से अनुसंधान केंद्र में मृगों का विस्तार नहीं किया जा सका है। केंद्र में सीमित जगह इसमें एक बाधा है। इस केंद्र को वन विभाग को हस्तांतरण की कार्रवाई की फाइल करीब 12 साल से अटकी है। वन विभाग को हस्तांतरण के बाद जगह और संसाधनों की कमी आड़े नहीं आएगी। दूसरी तरफ नस्ल वृद्धि (इनब्रीडिंग) की समस्या भी यहां मृगों के विस्तार में बाधक है। जानकारों का मानना है कि अच्छी नस्ल के लिए यहां नए कस्तूरा मृग भी लाने होंगे।