बस्तड़ी (पिथौरागढ़)। बस्तड़ी में आपदा ने जो जख्म दिया है उसको भर पाना संभव नहीं है। महिलाओं के आंखों के आंसू सूख गए हैं। वह प्रकृति और भगवान दोनों को कोसती हैं। महिलाओं का कहना है कि जिस माटी ने उनको अब तक जीवन को आगे बढ़ाने की राह दिखाई थी, आज उसी ने सबकुछ छीन लिया है। किसी का पति हादसे का शिकार हुआ तो किसी ने जवान बेटे को खो दिया।
महिलाएं कहती हैं कि अब गांव में कुछ नहीं हो सकता। बड़ी मेहनत से तैयार किए गए मकान जमींदोज हो गए। जानवरों का अता पता नहीं है। खेत मलबे में तब्दील हो गए हैं। लोगों की ओर से दी जाने वाली सांत्वना का कोई असर महिलाओं पर नहीं पड़ रहा है। वह जीवन की सच्चाई को समझ रही हैं।
उनको पता है जो हादसे का शिकार हो गए हैं वह लौटकर कभी नहीं आएंगे। उनके चेहरे में विवशता है, भय है और आगे की जिंदगी को चलाने की चिंता है। जो लोग बच गए हैं उनके लिए ज्यादा कठिनाई का समय शुरू हो गया है। यह आभास सभी महिलाओं को है।
बस्तड़ी निवासी रमा भट्ट (55) कहती हैं कि सरकार और प्रशासन चाहे कुछ कर ले, लेकिन अब बस्तड़ी गांव में किसी प्रकार की उम्मीद करना बेकार है। वह कहती हैं कि देवर और देवरानी हादसे का शिकार हो गए हैं। एक भरपूरा और हंसता खेलता परिवार एक पल में बिखर गया है। वह अब गांव में नहीं रहना चाहती।
बलमा देवी (90) कहती हैं कि जिंदगी के आखिरी मोड़ पर प्रकृति ने उनको जो दर्द दिया है उसे मरने के बाद भी नहीं भूल सकती। वह बताती हैं कि गांव में हमेशा खुशी थी। जीवन चहकता था। अब तो यही लगता है कि किसी की बुरी नजर गांव को लग गई है। इसका कोई निदान नहीं निकल सकता।
कमला भट्ट (30) कहती हैं कि मरघट में बदल गए गांव में अब कोई नहीं रह पाएगा। सरकार को जल्दी से यह प्रयास करना चाहिए कि गांव को अन्यत्र बसाया जाए। वह कहती हैं कि हादसे में जेठ की मौत हो गई। सारे सपने बिखर गए। कई युवा मलबे में दब गए हैं। यदि कोई फिर से गांव में रहने की बात करे तो संभव नहीं है।
75 वर्षीय मंगला देवी इतनी व्यथित हैं कि खुद की जिंदगी को कोस रही हैं। घटना के दिन को याद कर वह सिहर उठती हैं। उस दिन ऐसा लगा जैसे आसमान जमीन पर आ गया है। पूरी धरती कांपने लगी। बारिश से लोगों की चीख पुकार तक गायब हो गई। वह कहती हैं कि इतने बड़े हादसे के बाद खुद के जिंदा बचने का कोई अर्थ नहीं है।