मसूरिया गांव में खंडहर होते मकान
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मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण अपने पहाड़ के गांव खाली होते जा रहे हैं। लोगों को अपनी माटी छोड़नी पड़ रही है। सड़क की सुविधा मिलने के बाद भी लोगों का गांव छोड़ने का क्रम नहीं थमा है। ऐसा ही उदाहरण बनी बेड़ीनाग ब्लॉक के पुंगराऊं घाटी (पांखू) की मसूरिया ग्राम पंचायत। यहां सड़क पहुंचने के बाद भी लोग गांव छोड़कर जा रहे हैं।
कभी उपजाऊ गांवों की श्रेणी में शुमार मसूरिया गांव पर पलायन की काली छाया 80 के दशक से पड़नी शुरू हो गई थी। वर्ष 2007 में मसूरिया सड़क मार्ग से जुड़ा, लेकिन अन्य सुविधाएं शून्य रहीं। 10 साल पहले ग्राम पंचायत की आबादी 850 थी। आज 600 के करीब रह गई है। अस्पताल के लिए 85 किमी दूर जिला मुख्यालय या हल्द्वानी की दौड़ लगानी पड़ती है। पूर्व प्रधान करम सिंह कार्की, ग्रामीण दिलीप सिंह, सुंदर सिंह बटकोरा, सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश आर्या कहते हैं कि वर्ष 2008 के बाद से लोगों का गांव छोड़ने के क्रम में तेजी आई है। हाल के वर्षों में गांव से देब सिंह बटकोरा, लाल सिंह बटकोरा, हरीश सिंह, दीवान सिंह, हयात सिंह कार्की, नेत्र सिंह कार्की, दीवान सिंह रावत समेत करीब 15 परिवारों ने गांव छोड़ा है। लोग दिल्ली, हल्द्वानी बस रहे हैं।
मूलभूत सुविधाएं, छोटे उद्योग रोकेंगे पलायन
आपदा प्रभावित मसूरिया गांव के लोगों का कहना है कि मूलभूत सुविधाओं के साथ छोटे उद्योग स्थापित करने से पलायन रुकेगा। बेहतर शिक्षा, अस्पताल, कोचिंग इंस्टीट्यूट, कंप्यूटर शिक्षा की जरूरत गांव में रहने वाले लोगों को भी है। केवल सड़क के भरोसे पलायन पर रोक लगाने की कल्पना साकार होने वाली नहीं है।