काष्ठ उद्योग प्राचीन समय से पहाड़ की आर्थिकी से जुड़ा रहा है, आधुनिकता के असर से इस उद्योग को भी झटका लगा है लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि आज भी जो लोग काष्ठकला उद्योग से जुड़े हुए हैं, यह उद्योग उन लोगों को दो जून की रोटी तो उपलब्ध करा ही रहा है। जौलजीबी मेले में लकड़ी के बर्तन, सजावटी सामान की उपलब्धता बता रही है कि लोगों की अब भी इसमें रुचि है।
मुनस्यारी तहसील के शिलिंग उमरगड़ा निवासी काष्ठकला में माहिर पुष्कर राम हर साल की तरह इस बार भी जौलजीबी के मेले में लकड़ी से बने बर्तन, सजावटी सामान लेकर पहुंचे हुए हैं। उनके स्टाल में लकड़ी की दही जमाने वाली ठेकी के साथ ही छांछ बनाने वाला नलिया, लकड़ी के अन्य वर्तन उपलब्ध हैं, सजावटी सामान की भी उनके पास भरमार है।
पुष्कर राम बताते हैं कि वह हर साल जौलजीबी के मेले में उत्पाद लेकर आते हैं, उनका सारा सामान मेले में बिक जाता है। बताते हैं कि पिछले साल 30000 रुपये का सामान उन्होंने जौलजीबी मेले में बेचा। इस बार और अधिक सामान लेकर आए हैं। कहते हैं कि लकड़ी और सुविधाओं की कमी से काष्ठ उद्योग प्रभावित हो रहा है।
सरकार काष्ठकला के काम में लगे लोगों को बेहतर प्रोत्साहन दे तो यह उद्योग मौजूदा बाजार में टिकने का माद्दा रखता है। बताते हैं कि वर्ष 2013 की आपदा में उनकी लकड़ी के वर्तन बनाने वाली मशीन बह गई, इससे एक साल तक उनका काम प्रभावित रहा।
काष्ठकला के काम को संजोकर रखे पुष्कर राम बताते हैं कि उन्होंने यह हुनर अपने पिता पानू राम से सीखा। पिता ने दादा से काष्ठकला की बारीकियां सीखी। यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। वह इस काम को बढ़ाना चाहते हैं, कहते हैं कि सरकारी सहयोग मिला तो वह काष्ठकला के काम को बड़े स्तर पर करना चाहते हैं।