फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Pithoragarh News: पहले महावीर चक्र विजेता के गांव तक सड़क को पहुंचते-पहुंचते लग गए 78 साल

Sun, 02 Nov 2025 11:05 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
विज्ञापन
महावीर चक्र विजेता शहीर दीवान सिंह दानू। फाइल फोटो।
विज्ञापन
नाचनी (पिथौरागढ़)। देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले पहले महावीर चक्र विजेता शहीद दीवान सिंह दानू के गांव तक सड़क पहुंचने में पूरे 78 साल लग गए। शहीद की सोमवार को पुण्यतिथि है और इस अवसर से महज 11 दिन पहले ही उनके गांव मुनस्यारी ब्लॉक के गिन्नी तक सड़क कटिंग का कार्य पूरा हुआ है। हालांकि सड़क अभी कच्ची है। डामरीकरण में अभी समय लगेगा। फिर भी इस बार गांववासियों को लगता है कि शहीद को सच्ची श्रद्धांजलि आखिरकार मिल गई है।
विज्ञापन




अदम्य साहस की मिसाल



गिन्नी गांव के पुरदम तोक निवासी उदय सिंह दानू और रमुली देवी के घर 4 मार्च 1923 को जन्मे दीवान सिंह दानू 20 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए। 1 जून 1946 को उनकी पहली पोस्टिंग चार कुमाऊं रेजिमेंट में हुई। 1947 में आजादी के कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया। 3 नवंबर 1947 को बडगाम हवाई अड्डे पर पाकिस्तानी सैनिकों ने कबाइली वेश में हमला कर दिया। इस दौरान दीवान सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए 15 दुश्मनों को ढेर कर दिया लेकिन उसी मुठभेड़ में उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्हें देश के पहले सैनिक के रूप में मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। उनके नाम पर बिर्थी जीआईसी को समर्पित किया गया पर उनके गांव तक सड़क पहुंचने में लगभग आठ दशक लग गए।

नेहरू ने भेजा था हस्तलिखित पत्र

जब शहीद का पार्थिव शरीर गांव पहुंचा तो उनके हाथों में राइफल जकड़ी हुई थी। कुमाऊं रेजिमेंट के इतिहास की पुस्तक में भी उनकी वीरता का विस्तृत उल्लेख है। उनके शौर्य से प्रभावित होकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हस्तलिखित पत्र भेजा था जिसमें उन्होंने लिखा कि “पूरा देश उनके साहस और बलिदान के लिए कृतज्ञ है।
विज्ञापन




परिवार अब भी बेरोजगारी से जूझ रहा



शहीद के पिता उदय सिंह और माता रमुली देवी के चार पुत्र थे। दीवान सिंह सबसे बड़े थे। छोटे भाई उमेद सिंह और श्याम सिंह का निधन हो चुका है जबकि 88 वर्षीय पान सिंह अभी जीवित हैं। भतीजे श्याम सिंह दानू के पुत्र तेज सिंह दानू के अनुसार, ताऊ के सर्वोच्च बलिदान का परिवार को कोई विशेष लाभ नहीं मिला। उनकी पत्नी का भी कुछ समय बाद निधन हो गया था। आज तीन भाइयों के पांचों पुत्र बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें