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अब छटा बिखेरने लगे प्योली के फूल

Thu, 11 Feb 2016 10:55 PM IST
महेंद्र जंगपांगी/अमर उजाला, थल (पिथौरागढ़)।
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 वैसे तो मौसम में आए बदलाव के कारण इस बार प्योली के कुछ फूल दिसंबर में ही दिखने लगे थे, लेकिन अब प्योली व्यापक रूप से खिल गई है। प्योली को वसंत के आगमन का प्रतीक पुष्प माना गया है। जंगली प्रजाति के यह फूल जब खिलता है तो पूरे वातावरण में वसंत के आगमन का आभास हो जाता है।
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 प्योली मध्य हिमालय में 1800 मीटर की ऊंचाई तक पाई जाती है। इस फूल की पांच पंखुड़ियां एक साथ चिपकी होती हैं। यह खेतों, दीवारों और ढलानों में खिलता है। प्योली का बाटनिकल नाम रेनवासिया इंडिका है। इसकी पत्तियां घावों के भरने के काम आती हैं।

बकरियों को प्योली के फूल बहुत पसंद हैं। इनमें मिठास होती है। प्योली के फूलों को लोग पूजा-अर्चना के लिए भी उपयोग में लाते हैं। फूलदेई पर्व के समय तो प्योली के फूलों को घर के दरवाजे में डालना शुभ माना जाता है।
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पिथौरागढ़ राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में जंतु विज्ञान के प्राध्यापक डा. सीएस नेगी का कहना है कि प्योली कुमाऊं और गढ़वाल के पर्वतीय इलाके में वसंत के आगमन के समय खूब खिलता है। यह एक संस्कृति से जुड़ा फूल भी है।

गढ़वाल में एक किस्सा प्रचलित है-भैंस क बीच, प्योलि क फूल, कुमाऊं में प्योली फूल, पय्यां फूल, चारों तरफ फूलै फूल प्रचलित है। आयुर्वेद चिकित्सक एमडी डा. नवीन जोशी का कहना है कि प्योली औषधीय पौधा भी है। इसकी पत्तियों और शाखाओं को पीसकर घावों में लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाता है।

कुमाऊं में प्योली के फूल पर कई दंतकथाएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक घायल राजकुमार का प्योली ने अपनी पत्तियों को पीसकर इलाज किया था। राजकुमार ने स्वस्थ होकर प्योली से शादी कर ली।

वह प्योली को अपने महल में लाना चाहता था लेकिन प्योली जंगल की सुंदरता और एकांत को छोड़कर राजमहल में नहीं आई। राजकुमार ने प्योली के विरह में जंगल में ही प्राण त्याग दिए।
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