फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नहीं लगता होल्यारों का जमावड़ा

Mon, 21 Mar 2016 11:02 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, थल (पिथौरागढ़)।
विज्ञापन
विज्ञापन
थल (पिथौरागढ़)। थल के शिव मंदिर में होली की चतुर्दशी के दिन अब होल्यारों का जमावड़ा नहीं लगता। वर्ष 2000 से कई गांवों के होली दल मंदिर में नहीं आते। शराब के बढ़ते प्रचलन और उसके कारण होने वाले हुड़दंग से बचने के लिए अब गांव के लोगों ने मंदिर में अपने गांव की होली लाना बंद कर दिया है। पहले मसमोली, खोली, लेजम, धाराकौली, टोपराधार, दौबिजानी, भटीगांव, धिंगतड़ गांवों के साथ साथ अठखेत, बलतिर, हटवालगांव और थल बाजार की होली शिव मंदिर में आती थी। मंदिर में होली का बड़ा मिलन कार्यक्रम होता था।
विज्ञापन


लोग काफी देर तक होली गायन करते थे। एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछते थे। अब यह परंपरा धीरे धीरे समाप्ति की ओर है। इस समय सिर्फ अठखेत, बलतिर, हटवालगांव और थल बाजार के होली दल ही मंदिर में आते हैं। यह बात अलग है कि गांवों में लोगों ने होली की परंपरा को जिंदा रखा है। लोग चीर बंधन करते हैं। पूरे गांव में हर घर में होली गायक जाते हैं। रात में देर तक होली के कार्यक्रम चलते हैं। लोगों का मानना है कि पहाड़ की कई परंपराओं को शराब समाप्त करने लगी है। होली पर इसका ग्रहण सबसे पहले लगा है।

थल। थल के समाजसेवी दान सिंह बिष्ट का कहना है कि बुजुर्गों के समय से चली आ रही परंपरा को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। अभी भी सुधार किया जा सकता है। नई पीढ़ी को चाहिए कि वह इस दिशा में सजग होकर काम करें और परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास करें। ऐसा करने से सामाजिक माहौल मजबूत होगा। 
विज्ञापन


थल। थल के बुजुर्ग व्यवसायी जसवंत सिंह पांगती का कहना है कि गांवों से लगातार पलायन हो रहा है। किसी पर्व और आयोजन के समय भी लोग जुट नहीं पाते। होली के समय भी गांवों में गिने चुने लोग मौजूद रहते हैं। ऐसे में गांव से अन्यत्र होली दल ले जा पाना संभव नहीं होता। पहाड़ों के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। 

थल। थल निवासी चंद्रबल्लभ पाठक का कहना है कि नई पीढ़ी की रुचि इस तरह के आयोजनों से कम होती जा रही है। यह गंभीर चिंता का विषय है। नई पीढ़ी के लोग कुमाऊंनी तक नहीं जानते। उनको अपनी संस्कृति के संरक्षण के प्रति जागरूक रहना चाहिए। वह कहते हैं कि यह लक्षण भविष्य के लिए अच्छे नहीं हैं। 

थल। तेजम निवासी दीवानी राम का कहना है कि गांवों में भी होली के समय माहौल अच्छा नहीं रहता। गांवों में भी शराब, हुड़दंग होने लगा है। पहले का जैसा समाज नहीं जुटता। होली गायन के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है। वह कहते हैं कि अब समय काफी आगे निकल गया है। इसे वापस लौटा पाना संभव नहीं है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें