पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय के पुराने चौक बाजार में 194 साल से सामाजिक सौहार्द की होली खेली जा रही है। इसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग प्रतिभाग करते हैं। वर्षों की होली की परंपरा आज भी कायम है।
फाल्गुन मास में पर्वतीय क्षेत्र होली के रंगों से सराबोर रहता है। अधिकतर गांवों में खड़ी होली गायन में एक ही बिरादरी या अगल-बगल के गांव ग्रामीण शामिल रहते हैं। इससे इतर पुराने चौक बाजार में दोनों समुदायों के लोग होली पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। पुराने मुस्लिम परिवारों के लोग रात को चीर स्थल पर होली का गायन भी करते हैं।
दोनों समुदायों के लोग त्योहारों पर एक-दूसरे को गले मिल कर बधाई भी देते हैं। पिथौरागढ़ में 1790 में गोरखा शासन के बाद केंटोमेंट क्षेत्र बनाकर राशन एवं अन्य सामग्री की आपूर्ति के लिए आठ-दस परिवार बसाए गए। वर्ष 1832 में शाह, थापा, वर्मा, जोशी, खत्री, कपूर, मखौलिया, पुनेठा के साथ ही मीर और शेख परिवार के लोगों ने आपस में मंथन कर होली मनाने का निर्णय लिया।
होलाष्टक सामाजिक समिति के अध्यक्ष त्रिभुवन लाल शाह बताते हैं कि तब कुछ लोग आंवलाघाट से दुर्गम रास्ते को पार कर गंगोलीहाट से होली की चीर लाए। तब से यहां होली की शुरूआत की गई। उस समय चीड़ के छिलके की रोशनी में रात भर होल्यार कदम से कदम मिलाकर होली के गीत गाते थे।
मुस्लिम समुदाय के लोग भी ढोल की थाप पर होली गाते थे। रात को मीर परिवार की ओर से आलू, चाय आदि की व्यवस्था की जाती थी। अष्टमी पर्व पर चीर बंधन के साथ ही यहां होली गायन शुरू हो जाता है। पूर्व में यहां कुमौड़, पौण, पपदेव, लिंठ्यूड़ा, मड़खड़ायत, बिण, चैसर, पांडे गांव से भी होल्यार होली गाने आते थे।
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बोले होल्यार
वर्षों से सामाजिक सौहार्द की होली खेली जा रही है। इसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग प्रतिभाग करते हैं जो आपसी भाईचारे का प्रतीक है। - त्रिभुवन लाल शाह, अध्यक्ष, होलाष्टक सामाजिक समिति, पिथौरागढ़
- बचपन से ही पुराने चौक बाजार में होली खेलते आ रहे हैं। दोनों समुदायों के बीच आपसी सौहार्द वर्षों से बना हुआ है। हिन्दू-मुस्लिम दोनों एक-दूसरे के त्योहाराें में प्रतिभाग करते हैं। - सलीम खान, पूर्व सभासद