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कभी गुलजार अब हुआ वीरान

Fri, 09 Sep 2016 10:55 PM IST
कुंदन मेहता/अमर उजाला, गणाईगंगोली
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कोलूभेर गांव में बंद पड़ा मकान - फोटो : अमर उजाला
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स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार की मार पहाड़ के गांवों पर ऐसी पड़ रही है कि गांव के गांव खाली हो रहे हैं। कभी 35 परिवारों से गुलजार कोलूभैर गांव भी इन गांवों में शामिल हो गया है। गांव में अब केवल 5 परिवार रह गए हैं। हालांकि, इस गांव में वर्ष 2006 में सड़क पहुंच गई थी।
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वर्ष 1988 में आरपी शर्मा के परिवार, वर्ष 1989 में आरसी कोठारी के परिवार ने गांव छोड़ा। इसके बाद हीरा बल्लभ कोठारी, दीपक कोठारी, मनोज कोठारी के परिवार चलते बने। वर्ष 2006 में गांव सड़क से जुड़ा, लेकिन अन्य सुविधाएं शून्य रहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए लंबी दौड़ लगाने से परेशान गांव के अन्य लोग भी सुविधा संपन्न स्थानों पर बसने का मन बनाने लगे और गांव एक-एक कर खाली होने लगा। गांव से 30 परिवार पिथौरागढ़, हल्द्वानी, नैनीताल, लालकुआं, रुद्रपुर, देहरादून, लखनऊ शहरों में चल दिए।

अब गांव में तारा चंद्र कोठारी, गणेश चंद्र कोठारी, धर्मानंद कोठारी, पूरन चंद्र कोठारी, हरीश चंद्र कोठारी के परिवार ही रह गए हैं। मकानों से भरापूरा गांव वीरान सा नजर आता है। कभी रौनक बिखरने वाले मकान अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं।
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अभावों से निकले तो खुले तरक्की के रास्ते
कोलूभैर में रहकर कुछ नहीं हुआ। अभावग्रस्त इलाके का त्याग किया तो तरक्की के रास्ते खुल गए। कोलूभैर मूल के डीके शर्मा उत्तराखंड हाईकोर्ट के अपर महाधिवक्ता के पद तक पहुंचने में कामयाब रहे। आरपी शर्मा आईपीएस, संजय कोठारी और आरसी कोठारी सेना में कर्नल पद तक पहुंचे। कुमाऊं विश्वविद्यालय के खेल अधिकारी डा. नागेंद्र शर्मा का मूल गांव कोलूभैर ही है। गांव छोड़ने वाले परिवारों में 5 इंजीनियर, 7 शिक्षक, 6 अधिवक्ता हैं। कई इनकम टैक्स आफीसर, दर्जनों लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में सेवा दे रहे हैं।
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