गर्ब्यांग गांव में लगे पवन ऊर्जा और सौरऊर्जा के प्लांट
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सीमा की निगेहबानी में सीमांत के लोगों का भी अहम रोल होता है, लेकिन हमारी सरकारें, सरकारी महकमे सीमांत के गांवों के लोगों को सुविधा दिलाने के प्रति कितने गंभीर रहते हैं, यह चीन और नेपाल की सीमा से सटे गर्ब्यांग गांव की बिजली व्यवस्था को देखकर लगाया जा सकता है। गांव में लगे दो पवन ऊर्जा संयंत्रों में से एक पिछले साल से बंद पड़ा है। इस कारण गांव के लोगों को केवल रात में बिजली मिल पा रही है। वहीं गर्ब्यांग से दो किमी उस पार नेपाल का छांगरू गांव बिजली से रोशन रहता है।
सीमांत के इस गांव को बिजली उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2013 में उरेडा के माध्यम से 5 किलोवाट के दो पवन ऊर्जा संयंत्र और 5 किलोवाट का सौरऊर्जा संयंत्र गांव में स्थापित किया गया। तब तक गर्ब्यांग में बिजली की कोई सुविधा उपलब्ध थी। दोनों संयंत्रों ने काम करना शुरू किया तो गर्ब्यांग गांव के लोगों को बिजली मिलने लगी। करीब दो साल बाद पवन ऊर्जा के एक संयंत्र ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद गांव में बिजली की किल्लत शुरू हो गई। गांव के लोग बताते हैं कि उन लोगों को रात के 8 बजे से सुबह 5 बजे तक ही बिजली मिल पाती है।
80 परिवार वाला गर्ब्यांग माइग्रेशन वाला गांव है। बर्फबारी के कारण गर्ब्यांग के लोग दिसंबर से मार्च तक निचले क्षेत्रों में प्रवास पर रहते हैं। पहले गांव के लोग पालतू जानवरों के साथ तीन महीने तक तराई के इलाके में जाते थे। अब गांव के 50 परिवार दिसंबर से मार्च तक धारचूला प्रवास पर रहते हैं। 30 परिवार जानवरों के साथ हमेशा गांव में रहते हैं। हमेशा गांव में रहने वाले ये लोग खासकर जाड़ों में पर्याप्त बिजली न मिलने से परेशान रहते हैं।
संचार सेवा में भी छांगरू से टक्कर नहीं ले पा रहा गर्ब्यांग
सीमांत गांव गर्ब्यांग के लोगों को अब तक संचार सुविधा भी नहीं मिल पाई है। वहीं नेपाल के छांगरू में संचार की पुख्ता व्यवस्था है। गर्ब्यांग के लोगों को मजबूरन नेपाली नेटवर्क का सहारा लेना पड़ रहा है। यानि कि गर्ब्यांग वालों का काम नेपाल की संचार व्यवस्था के सहारे है। गांव के लोगों के पास नेपाली सिम हैं।
गर्ब्यांग में लगे पवन ऊर्जा के संयंत्रों में से 1.2 किलोवाट का संयंत्र काम नहीं कर रहा है। पवन ऊर्जा के दूसरे संयंत्र और सौरऊर्जा के संयंत्र से 8.8 किलोवाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। पवन ऊर्जा के खराब संयंत्र को ठीक किया जाएगा। -अखिलेश शर्मा, परियोजना प्रबंधक, उरेडा पिथौरागढ़।