गीठी के नाम से पहाड़ का हर व्यक्ति परिचित है। जो लोग इसकी खूबी जानते हैं, इसका भरपूर उपयोग करते हैं। आलू प्रजाति की गीठी को पोटेटो याम गीठी के नाम से जाना जाता है। गीठी को कई बीमारियों में कारगर माना जाता है। गीठी का वैज्ञानिक नाम डायोसकोरिया और बाटनिक नाम वलवीफेरा है।
गीठी को जून, जुलाई में रोपित किया जाता है। अक्तूबर में गीठी के बेल फल देने लगते हैं। गीठी को आग में भूनकर खाने के साथ ही इसकी सब्जी बनाई जाती है। गीठी की तासीर गर्म मानी जाती है। सर्दियों के सीजन में यह काफी गुणकारी मानी जाती है। गीठी के गुणों के जानकार गीठी को बड़े चाव से खरीदते हैं। महाशिवरात्रि के व्रत में भी गीठी का उपयोग किया जाता है। जिला उद्यान अधिकारी डा. मीनाक्षी जोशी बताती हैं कि गीठी खांसी, दमा, डायरिया रोग में कारगर होने के साथ ही आंखों की ज्योति बढ़ाने में सहायक होती है।
वह बताती हैं कि मैदानी क्षेत्र में भी लोग गीठी का उत्पादन करते हैं। डा. जोशी के अनुसार गीठी की एक प्रजाति कड़वी होती है। इसका दवा के रूप में उपयोग और अधिक असर कारक होता है। वह कड़वी गीठी पर और शोध की जरूरत बताती हैं। अस्कोट निवासी 95 वर्षीय लछम सिंह पाल गीठी का उपयोग करने की सलाह लोगों को देते हुए कहते हैं कि इसका उपयोग जाड़ों में कई बीमारियों से दूर रखता है।
घाटे का सौदा नहीं है गीठी
पहाड़ पर बड़ी मात्रा में गीठी का व्यावसायिक उपयोग तो नहीं होता, लेकिन जो लोग इसका उत्पादन करते हैं वह इसे घाटे का सौदा भी नहीं मानते। अस्कोट निवासी इंद्रबहादुर पाल बताते हैं कि वह गीठी का बड़े स्तर पर उत्पादन करते हैं। महाशिवरात्रि के दिन कई क्विंटल गीठी बिकती है। अकेले वह डेढ़ क्विंटल तक गीठी बेचते हैं। पहाड़ पर गीठी 30 से 40 रुपए किलो बिकती है।