पाल राजवंश के इन हथियारों का दीदार करेंगे कैलाश यात्री
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688 साल तक (वर्ष 1279 में अभय पाल देव से 11 नवंबर 1967 टिकेंद्र बहादुर पाल तक) अस्कोट रियासत पर राज करने वाले कत्यूरीवंशी पाल राजाओं को अतिथि सेवा, दानवीरता के साथ ही वीरता के लिए जाना जाता है। पाल राजवंश की धरोहरों से वीरता की झलक मिलती है। राजवंश की धरोहरों में पंजाब रियासत के सेनापति जनरल जोरावर सिंह की तलवार भी शामिल है। बीते 12 वर्ष से राजवंश कैलाश मानसरोवर यात्रियों को धरोहरों के दीदार करा रहा है। इस बार भी यात्रियों को जोरावर सिंह की तलवार और अन्य संग्रहणीय वस्तुओं को देखने का मौका मिलेगा।
वर्ष 1962 तक पाल राजवंश ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का संचालन करता था। राजमहल में यात्रियों के रात्रि विश्राम और भोजन की व्यवस्था होती थी। कैलाश यात्रा से राजवंश के जुड़ाव को देखते हुए वर्ष 2005 से 7वीं वाहिनी आईटीबीपी मुख्यालय मिर्थी (डीडीहाट) में राजवंश की प्राचीन धरोहरों से कैलाश यात्रियों को रूबरू कराया जाता है। पाल राजवंश के वर्तमान वारिस रजवार भानुराज पाल यात्रियों के स्वागत के लिए आईटीबीपी वाहिनी मुख्यालय में मौजूद रहते हैं।
रजवार भानुराज पाल बताते हैं कि जनरल जोरावर सिंह पंजाब के राजा रणजीत सिंह के सेनापति थे। जनरल जोरावर सिंह ने वर्ष 1819 में तिब्बत पर आक्रमण कर दिया। अस्कोट रियासत की सेना ने तिब्बत का साथ दिया था। अस्कोट की सेना ने तिब्बत में लड़ाई के दौरान जनरल जोरावर सिंह को मार गिराया और विजय के प्रतीक के रूप में अस्कोट की सेना जोरावर सिंह की तलवार लेकर आई। प्रदर्शनी में जनरल जोरावर सिंह की तलवार के साथ ही राजवंश की छोटी-बड़ी तलवार, छोटी-बड़ी खुकरी, खंजर, अशरफी, मिट्टी के तेल से चलने वाली इस्त्री (प्रेस), केतली, सिगरेट केश, सोना जड़ित कपड़े आदि कैलाश यात्रियों के दर्शनार्थ रखे जाते हैं। रजवार भानुराज ने बताया कि हर साल यात्रा प्रारंभ होने से पहले राजवंश की धरोहरों को आईटीबीपी वाहिनी मुख्यालय पहुंचा दिया जाता है।
राजवंश करना चाहता है राजमहल में आवभगत
पाल राजवंश के वर्तमान वारिस रजवार भानुराज पाल कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने सदियों तक कैलाश यात्रा का संचालन किया था। राजमहल से यात्रा की यादें जुड़ी हुई हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रियों को राजमहल के दीदार कराए जाने चाहिए। राजमहल यात्रियों की आवभगत करने के लिए तैयार है। अपनी मंशा वह सरकार के सामने भी रख चुके हैं।