आज चैत्र संक्रांति है। कुमाऊं में आज के दिन देली पूजन की परंपरा रही है। बच्चे थाली में फूल और अक्षत लेकर हर घर की देली (देहरी) पूजन के लिए उत्साह के साथ निकले। फुलदेई, फुलदेई, छम्मा देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार, यो देली सौं, बारंबार नमस्कार (अर्थात देहरी में फूल डाल रहे हैं, यह द्वार भंडार भरे, इस देहरी को बार बार नमस्कार)।
बच्चों को देली पूजन के बदले गुड़, पैसे, चावल आदि सामग्री दी जाती है।
चैत्र हिंदू पंचांग के अनुसार पहला महीना होता है। बसंत ऋतु का आगमन होने लगता है। विभिन्न प्रकार के फूल खिलने लगते हैं। चैत्र को पवित्र महीना कहा जाता है। इस महीने देवी देवताओं की पूजा के अनुष्ठान होते हैं। इस कारण भी चैत्र का बड़ा महत्व है। फुलदेई की परंपरा गांवों में आज भी जीवित है। बालिकाओं ने गांव के हर घर में जाकर द्वार पूजा की। शहरों में भी थोड़ा बहुत इस परंपरा का अस्तित्व बचा हुआ है। कम से कम अपने पड़ोस के घरों की देहरी का पूजन बालिकाएं जरूर करती हैं। थल, गणाईगंगोली, डीडीहाट में फुलदेई का पर्व उल्लास के साथ मनाया गया।
चंपावत में रविवार को फूल देई पर्व उल्लास के साथ मनाया गया। छोटे बच्चे विशेषकर कन्याओं ने घरों में जाकर देहरी का पूजन किया। बच्चों ने फूल देई, छम्मा देई। देणी द्वार भर-भकार, ये देहरी से बारंबार नमस्कार। कहते हुए पुष्प और अक्षतों से देहरी को पूजा। चैत्र संक्रांति को मनाए जाने वाली फूल देई को खुशहाली और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है।