बस्तड़ी की आपदा में बेघर हुए दीवानी राम का परिवार एक वर्ष से पंचायतघर में ठहरा हुआ है। उनको मकान का पैसा इस कारण नहीं मिला, क्योंकि उनके नाम पर सिंघाली या आसपास के इलाके में कहीं पर भी जमीन नहीं है। सरकार ने मकान बनाने के लिए जमीन का पट्टा देने का वादा तो किया था, लेकिन अब तक यह पट्टा उनको नहीं मिल पाया है। दानी राम का कहना है कि पता नहीं कब तक पंचायतघर में रहकर दिन गुजारने होंगे।
बस्तड़ी की आपदा के समय अनुसूचित जाति के तीन परिवार भी प्रभावित हुए थे। इनमें से दानी राम को तो पंचायतघर में जगह मिल गई। विजय राम और भागीरथी देवी ने किराए पर कमरा ले लिया। यह तीनों परिवार इसी उम्मीद में थे कि जिस समय सभी प्रभावितों को मकान बनाने के लिए धनराशि मिलेगी, उस समय उनको भी मदद मिल जाएगी, लेकिन तीनों के सामने जमीन का पेच फंस गया।
तीनों परिवारों के पास बस्तड़ी गांव में सिर्फ दो-तीन नाली से ज्यादा जमीन नहीं है। यह जमीन भी मलबे की भेंट चढ़ गई। बाद में सरकार की ओर से कहा गया कि तीनों परिवारों को सरकारी जमीन का आवंटन किया जाएगा और पट्टा जारी होगा। आपदा के तुरंत बाद बस्तड़ी पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तो यह एलान किया था कि जमीन का पट्टा देने की कार्रवाई एक माह में पूरी कर ली जाएगी, पर एक साल बीतने पर भी यह पता नहीं है कि जमीन के पट्टे वाली फाइल कहां घूम रही है। 30 जून की रात बस्तड़ी में आपदा आई थी और एक जुलाई को सारा गांव शिफ्ट कर दिया गया।
जिन परिवारों के नाम पर जमीन थी, उनको तो मकान बनाने के लिए शासन से धनराशि मिल गई है लेकिन अनुसूचित जाति के यह तीनों परिवार अब तक अधर में लटके हुए हैं। इस मामले में तहसीलदार अर्जुन राम का कहना है कि तीनों परिवारों के लिए जमीन का चिन्हीकरण कर शासन को पट्टा जारी करने के लिए भेज दिया गया था। तहसील प्रशासन को यह मालूम नहीं है कि प्रस्ताव की फाइल कहां पर अटकी है।
कुछ दिनों के लिए दिखती है संवेदना
आपदा के बाद राहत सामग्री, राहत राशि जमा करने वाले कई संगठन सक्रिय हो जाते हैं। इन संगठनों को लगता है कि जैसे वही आपदा पीड़ितों का सारा दर्द दूर कर देंगे, लेकिन कुछ दिन बाद यह संगठन गायब हो जाते हैं और उनकी संवेदना भी नजर नहीं आती। आपदा पीड़ित दानी राम का कहना है कि पीड़ितों को मदद की जरूरत अब है, लेकिन कहीं कोई नजर नहीं आता।
सरकार की नीतियां स्पष्ट नहीं
आपदा पीड़ितों के मामले में सरकार की नीति स्पष्ट नहीं है। बस्तड़ी निवासी शंकर भट्ट कहते हैं कि राहत राशि का मानक क्या होना चाहिए, जमीन का कितना मुआवजा दिया जाना चाहिए, घायलों के इलाज के लिए कितना खर्च मिलना चाहिए, यह कहीं पर भी स्पष्ट नहीं है। नेता अलग घोषणा करते हैं और अधिकारी नियमों की बाध्यता बताकर मामले को उलझा देते हैं।