नाचनी (पिथौरागढ़)। कोरोना महामारी के बीच रामगंगा घाटी के किसानों ने खरीफ फसलों की 75 प्रतिशत बुआई कर दी है। डेढ़ सप्ताह पहले बोए गए धानों पर इंसानों के माध्यम से खींचे जाने वाले लकड़ी के गुड़ाई यंत्र (दनाली) डालने का काम जोरों पर है। ग्रामीणों का कहना है कि पूर्वजों का जैविक यंत्र दनाली भविष्य में भी कारगर साबित होगा।
नाचनी के तल्ला भैसकोट निवासी 75 वर्षीय दिव्यांग त्रिलोक सिंह दसौनी दनाली खींच कर धानों की गुड़ाई कर रहे हैं। उनकी पुत्र वधू गुड़ाई यंत्र से जमीन पर संतुलित दबाव देतीं हैं। इससे जमीन की पपड़ी टूटती है। सघन पौधों का विरलीकरण होने से अच्छी पैदावार होती है।
आज भले ही उन्नत कृषि तकनीक युक्त कई मशीनें आ गई हों लेकिन पहाड़ में अब भी परंपरागत यंत्रों से ही खेती की जाती है। गुड़ाई के काम आने वाली दनाली की बनावट कंघेनुमा होती है। लकड़ी के दो फीट लंबे और पांच इंच मोटे गिल्टे में एक से डेढ़ इंच की दूरी पर मजबूत लकड़ी के तराशे हुए एक फीट लंबे नुकीले डंडे फिट किए जाते हैं।
मध्य से एक छह फीट का डंडा फिट किया जाता है। ऊपर की ओर दो दस्तों से दनाली को पकड़कर संतुलित किया जाता है। इसमें धातु की कील भी नहीं लगती। इसे महिला-पुरुष दोनों चलाते हैं।
तल्ला भैंसकोट के युवा किसान जगत दसौनी कहते हैं कि भले ही अब आधुनिक कृषि यंत्रों की उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन दनाली की उपयोगिता पहाड़ी खेती के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हमारे पूर्वजों ने लकड़ी के इस यंत्र दनाली विकसित किया था। ये भविष्य में भी अपना स्थान बनाए रखेगा।