बस्तड़ी में 30 जून की रात बादल फटने की घटना में पशुधन की भी भारी क्षति हुई थी। आपदा से पहले रोजाना 100 लीटर दूध बाजार में बेचने वाले बस्तड़ी के लोगों के सामने अब छोटे बच्चों के लिए भी दूध का इंतजाम करना कठिन हो गया है। जानवरों के मलबे में दबने से लोगों का दुग्ध व्यवसाय समाप्त हो चुका है।
पशुपालन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि आपदा में 23 दुधारू गाय, 8 भैंस, 2 बैल और 35 बकरियों की मौत हुई थी। सिर्फ 50 जानवर जिंदा बचे थे, लेकिन उनके लिए चारे और आवास की व्यवस्था न हो पाने के कारण लोगों ने सभी जानवर औने-पौने दामों पर बेच दिए। अब कैंपों में रह रहे लोगों के खुद के लिए ही आसरा नहीं बचा है। जानवरों की व्यवस्था कैसे करें।
बस्तड़ी के लोगों के दर्द को करीब से देखने से पता चलता है कि आपदा ने लोगों को हर तरफ से चोट दी है। उनकी आर्थिकी के मूल आधार समाप्त हो गए हैं। खेती उजड़ गई है। चारे की घास पैदा करने वाले जंगल मलबे से नष्ट हो गए हैं। जानवरों के मरने से दूध का व्यवसाय ठप हो गया है। लोगों का कहना है कि इस समय तो खुद के सिर छुपाने की समस्या आ रही है, यदि आने वाले वर्षों में लोग इस संकट से उबरकर अपना घर-बार जमाने की सोचेंगे तो उनको हर व्यवस्था को नए सिरे से जुटाना पड़ेगा।
जानवरों के लिए उपलब्ध कराया चारा
पशुपालन विभाग ने बस्तड़ी में जितने जानवर जिंदा बचे हैं, उनके लिए चारे की व्यवस्था की है। मलबे से तीन दिन बाद जिंदा निकाले गए चार जानवरों का तत्काल इलाज किया गया। पशु चिकित्सक डा. तरुण कुमार ने बताया कि अब भी बस्तड़ी जाकर जानवरों की देखरेख की जा रही है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. जीएस धामी ने बताया कि बस्तड़ी में डॉक्टरों की टीम नियमित भेजी जा रही है।
उन्नत नस्ल के पशु दिए जाएंगे
डीएम एचसी सेमवाल ने तहसील प्रशासन से कहा कि यदि बस्तड़ी के आपदा प्रभावित फिर से पशु पालना चाहते हैं तो उनकी सूची तैयार की जाए और उनको उन्नत नस्ल के पशु उपलब्ध कराए जाएं। उन्होंने कहा कि लोगों की हरसंभव मदद के लिए सरकार तैयार है। किसी को भी परेशानी नहीं होने दी जाएगी।