गांवों में सड़क, बिजली, चिकित्सा और शिक्षा की सुविधा न होने से कई गांव खाली हो गए हैं। लोग बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए लगातार शहरों को जा रहे हैं, जिस कारण अब गांवों में नवरात्र के समय कन्या पूजन के लिए 10 से कम वर्ष की कन्याएं भी नहीं मिल पा रही हैं। गांवों में अब सिर्फ गरीब और अनुसूचित जाति के कुछ परिवार ही रह गए हैं।
डिगरा गांव के सामाजिक कार्यकर्ता भगवान सिंह ने बताया कि उनके गांव में 150 परिवारों में से मात्र 20 परिवार ही रहे हैं, जिनमें से 12 परिवार अनुसूचित जाति और 8 परिवार सामान्य जाति के बचे हैं। लोग हाड़तोड़ मेहनत कर बच्चों को शहरों में पढ़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। गुड़ोली के कवींद्र पांडे, राजेंद्र पांडे, मदन पांडे का कहना है कि गांव में 300 परिवारों में से 100 परिवार ही रह गए हैं। पढ़ाई के लिए गांव से लोगों का शहरों की ओर जाने का क्रम लगातार बढ़ रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता दीपक पांडे कहते हैं कि लोगों का गांव से टूटता मोह चिंता का विषय है। क्षेत्र में सभी गांवों में अब गिने-चुने परिवार ही बसे हैं। गांव, खेत खलिहानों के खाली होने के पीछे शासन भी जिम्मेदार है। कहा कि अगर गांव में लोगों को अच्छी शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, पानी, बिजली की सुविधा मिलती तो लोग इस तरह गांव नहीं छोड़ते।