राजकीय महिला अस्पताल में 2004 से कोई डॉक्टर नहीं है। अस्पताल का उद्घाटन 10 सितंबर 2003 को हुआ था। तब एक महिला डॉक्टर की यहां तैनाती की गई थी। इसके अगले साल ही इस महिला डॉक्टर ने यहां से अपना स्थानांतरण करा दिया। उसके बाद शासन ने किसी भी डॉक्टर की यहां तैनाती की जरूरत ही नहीं समझी। उलटा शासन ने 2009 में यहां से फार्मेसिस्ट का भी स्थानांतरण कर दिया। तब से फार्मेसिस्ट का पद भी रिक्त है।
उत्तराखंड शासन ने महिला उत्थान योजना के तहत थल में महिला अस्पताल खोला था। इस अस्पताल के माध्यम से इस घाटी के 114 गांवों को स्वास्थ्य सुविधा देने का इरादा सरकार ने किया था, लेकिन अब लाखों रुपये की लागत से बने इस अस्पताल से लोगों को कोई सुविधा नहीं मिलती। सिर्फ एक स्टाफ नर्स और एएनएम के सहारे यह अस्पताल चल रहा है। अस्पताल में अल्ट्रासाउंड, पैथालॉजी, एक्सरे की कोई सुविधा नहीं है। यदि किसी को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो जाए तो उसे 50 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है।
लोगों ने अस्पताल की दशा सुधारने के लिए कई बार आवाज उठाई, लेकिन किसी भी सरकार ने अस्पताल में डॉक्टर की तैनाती करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। मुख्य चिकित्साधिकारी डा. उषा गुंज्याल का कहना है कि जिले में डॉक्टरों की कमी है। यदि नए डॉक्टरों की नियुक्ति होगी तो थल अस्पताल में प्राथमिकता से तैनाती की जाएगी।
सरकार की कथनी, करनी में अंतर है
थल निवासी दीपा देवी का कहना है कि महिला उत्थान की बात करने वाली सरकारों को खुद सोचना चाहिए कि बिना डॉक्टर के महिला अस्पताल में इलाज कैसे होता होगा। वह कहती हैं कि सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। किसी भी नेता ने अस्पताल में डॉक्टर को नियुक्त करने का प्रयास नहीं किया।
जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो
थल निवासी हंसा बाफिला का कहना है कि महिला अस्पताल में शीघ्र दो डॉक्टरों की तैनाती की जाए और फार्मेसिस्ट नियुक्त किया जाए। अस्पताल में उपकरण, दवाओं की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करे। यदि स्टाफ की नियुक्त नहीं हो पाती तो अस्पताल को बंद कर देना चाहिए।