पिथौरागढ़। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत के महाविद्यालयों को कुमाऊं विश्वविद्यालय से अलग कर सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय से संबद्ध किए जाने के निर्णय से सीमांत जनपद के छात्र-छात्रा नाखुश हैं। छात्र नेताओं ने इसे निराश करने वाला फैसला बताया है। उनका कहना है कि बीते 71 वर्षों से पिथौरागढ़ में पृथक विवि की मांग की जा रही है। पिछले साल भी छात्रसंघ के आह्वान पर पिथौरागढ़ विश्वविद्यालय की मांग को युवाओं और यहां के नागरिकों ने पुरजोर तरीके से उठाया गया था। बावजूद इसके अलग विश्वविद्यालय की मांग पर ध्यान नहीं देकर सीमांत की उपेक्षा की गई है।
बोले लोग-
पहले से ही छात्रसंख्या का दबाव झेलते पिथौरागढ़ महाविद्यालय के परिसर बनने के बाद जब छात्रसंख्या सीमित कर दी जाएगी तो अन्य विद्यार्थी किस तरह और कहां प्रवेश ले पाएंगे यह एक बड़ा सवाल है। इस पर तत्काल विचार करने की जरूरत है - राकेश जोशी, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष पिथौरागढ़।
------
सामरिक रूप से महत्वपूर्ण सीमांत पिथौरागढ़ में विश्वविद्यालय की स्थापना करना सीमा पर तनावों के इस दौर में एक मजबूत कूटनीतिक संदेश होता। विश्वविद्यालय बनता तो पिथौरागढ़ के साथ ही चंपावत जनपद के छात्रों को भी सुविधा मिलती। - चंद्रशेखर कापड़ी, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी।
------
1973 में बने कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना में बलिदान पिथौरागढ़ ने ही दिया था। तब विवि की स्थापना के बाद अल्मोड़ा और नैनीताल कैंपस की स्थापना हुई थी। 47 साल बाद दूसरा विश्वविद्यालय अल्मोड़ा में बना। यह पिथौरागढ़ केे साथ धोखा है। - निर्मल चौधरी, बार एसोसिएशन पिथौरागढ़।
सीमांत के साथ हुआ खिलवाड़
व्यापार संघ अध्यक्ष शमशेर महर ने कहा कि विश्वविद्यालय का मुख्यालय अल्मोड़ा हो जाने से सीमांत के क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को कोई फायदा होता नहीं दिखता। जनमंच संयोजक भगवान रावत के अनुसार यह सरकार का अनुचित और सीमांत के साथ खिलवाड़ करने वाला निर्णय है। पूर्व अध्यक्ष महेंद्र रावत ने कहा कि विवि की मांग को लेकर संघर्ष के नये तरीकों पर साथ कि साथ मिलकर आगे बढ़ाया जाएगा।