थल में झूलापुल पर उगा पीपल का पेड़
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अंग्रेजी शासनकाल में वर्ष 1900 में थल में रामगंगा पर बनाए गए झूलापुल का उपयोग 1962 में इसी स्थान पर मोटर पुल बनने से समाप्त हो गया, लेकिन झूलापुल के दोनों ओर बनाए गए स्तंभ हटाए नहीं गए। झूलापुल के इन स्तंभों पर उगे पीपल के दो पेड़ अब मोटर पुल के लिए भी खतरा बन रहे हैं। बताया गया कि पहले लोग रामगंगा को पार करने के लिए रस्सियों का सहारा लेते थे। बाद में अंग्रेजों ने इस स्थान पर झूलापुल बना दिया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि झूलापुल के स्तंभ पर कई वर्षों से पीपल के दो पेड़ उग आए हैं। पीपल के प्रति धार्मिक आस्था जुड़ी होने के कारण इनको काटा नहीं गया। अब यह पेड़ झूलापुल के स्तंभ के साथ-साथ मोटर पुल की दीवार के लिए भी खतरा बन रहे हैं। पीपल की जड़ों ने मोटर पुल की दीवारों को भी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। स्थानीय लोग इसी चिंता में हैं कि यदि पीपल के पेड़ों को नहीं हटाया गया तो वह मोटर पुल के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। वहीं, लोनिवि के अधिशासी अभियंता पीसी जोशी ने कहा है कि पीपल के पेड़ों को हटाने के लिए तत्काल कदम उठाया जाएगा। बता दें कि थल का मोटर पुल लगातार कमजोर हो रहा है। इस कारण इस पर बड़े वाहनों का संचालन बंद किया गया है। यदि पीपल की जड़ों से दीवारों को नुकसान पहुंचा तो नई समस्या खड़ी हो जाएगी।
झूलापुल को फिर से बनाया जाए
समाजसेवी भुवन भट्ट का कहना है कि झूलापुल को फिर से बनाया जाना चाहिए। इससे पैदल आवाजाही करने वालों को आसानी होगी। साथ ही झूलापुल के शानदार स्तंभों का फिर से उपयोग हो जाएगा। यदि पुल पर लोगों की निरंतर आवाजाही बनी रहेगी तो वनस्पति और पेड़-पौधे नहीं उग पाएंगे। इससे किसी प्रकार का खतरा भी नहीं होगा।
पेड़ काटने के लिए तकनीक का प्रयोग हो
स्थानीय निवासी गिरीश चंद्र भट्ट का कहना है कि पीपल के पेड़ को तकनीक का प्रयोग कर काटा जा सकता है। यदि कोई पेड़ खतरे का कारण बन रहा हो तो उसे हटाने में कोई समस्या नहीं है। वह कहते हैं कि पीपल की जड़ें काफी मोटी होती हैं और वह दीवारों को भी नुकसान पहुंचा देती हैं। प्रशासन को जल्दी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए।