लाखों पेड़ लगाकर लोगों को स्वस्थ वायु उपलब्ध कराने के लिए जीवनभर जूझते रहे वृक्षमित्र कुंवर दामोदर राठौर नहीं रहे। 90 वर्षीय राठौर ने बुधवार सुबह जिला अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह 25 मई से जिला अस्पताल में भर्ती थे। राठौर के निधन का समाचार सुनते ही लोगों में शोक छा गया। भारी संख्या में लोगों ने अस्पताल पहुंचकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। राठौर को डीडीहाट मेें भी श्रद्धांजलि दी गई।
अप्रैल में जंगल में लगी आग बुझाने के दौरान धुएं से कुंवर दामोदर के गले और फेफड़े में इंफेक्शन हो गया था। जंगल को आग से बचाने के दौरान वह झुलसे भी थे। बुधवार सुबह डॉक्टरों ने राठौर का चेकअप किया। तबियत अधिक खराब होने के कारण उन्हें हायर सेंटर रेफर करने की कार्रवाई चल रही थी। सुबह करीब साढ़े आठ बजे उनकी कुशलक्षेम पूछने अस्पताल पहुंचे जिला पंचायत सदस्य जगदीश कुमार ने राठौैर को हिलाया तो कोई हरकत नहीं हुई। इसकी जानकारी डॉक्टरों को दी गई। चेकअप करने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। राठौर के निधन का समाचार सुनकर भारी संख्या में लोग अस्पताल पहुंचे।
लोगों ने उनके निधन की सूचना जिलाधिकारी एचसी सेमवाल को दी। सेमवाल ने आपदा प्रबंधक विभाग के वाहन से कुंवर दामोदर राठौर का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव भनड़ा भिजवाया। जिला अस्पताल में वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल, जिला विकास अधिकारी गोपाल गिरि, अनुराग आर्य समेत तमाम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
उधर, डीडीहाट के रामलीला मैदान में हुई शोकसभा में तहसीलदार पीसी पंत, नगर पंचायत अध्यक्ष कवींद्र शाही, डीडीहाट यूथ सोसायटी के अध्यक्ष संजू पंत, पूर्व प्राचार्य डीएस पांगती के साथ ही उनके पैतृक गांव भनड़ा और ननपापू के ग्रामीण भारी संख्या में मौजूद थे। उनका अंतिम संस्कार सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में थल के रामगंगा घाट में किया गया।
हर कोई नहीं बन पाता कुंवर दामोदर
पिथौरागढ़। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बहुत से लोग और संगठन काम कर रहे हैं, लेकिन हर कोई कुंवर दामोदर राठौर नहीं बन पाता। वृक्षमित्र कुंवर दामोदर राठौर के यूं ही अचानक चले जाने से एक शून्यता पैदा हुई है। ऐसा प्रकृति प्रेमी फिर इस धरती पर जन्म लेगा, यह संभव नहीं लगता। वर्ष 1926 में डीडीहाट के भनड़ा गांव में जन्मे प्रकृति के रखवाले कुंवर दामोदर राठौर ने 18 साल की उम्र में पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा उठाया। लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करने लगे। लंबे समय तक ग्राम विकास अधिकारी के पद पर रहे राठौर का पर्यावरण प्रेम सरकारी सेवा में रहने के दौरान भी बना रहा। वर्ष 1975 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह प्रकृति की सेवा में लगा दिया। गांव में ही उन्होंने शांतिकुंज की स्थापना कर सैकड़ों हेक्टेयर जमीन को हराभरा करने का बीड़ा उठाया। इसके लिए अपने प्रयासों से पौधशाला तैयार की। उन्होंने कई सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में कारगिल स्मृति वन, बाल स्मृति वन, शांतिकुंज वन की स्थापना की। कुंवर राठौर को वर्ष 2000 में भारत सरकार के पर्यावरण विकास मंत्रालय ने इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्षमित्र पुरस्कार से नवाजा। यह पुरस्कार उन्हें दिल्ली में तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री टीआर बालू ने दिया था। वृक्षमित्र नदियों के किनारे भूकटाव रोकने के लिए नदियों में पेड़ों के बीज डालने पर जोर देते थे। उन्होंने इस बात को कई मंचों से उठाया, लेकिन सरकारी तंत्र ने उनकी सलाह पर अमल नहीं किया। वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल ने कहा कुंवर दामोदर राठौर वास्तविक कर्मयोगी थे। उनके जैसे लोग विरले ही पैदा होते हैं।
जाते-जाते भी पर्यावरण संरक्षण की ही चिंता
पिथौरागढ़। वृक्षमित्र कुंवर दामोदर राठौर ने बीमारी के दौरान जिला अस्पताल में लोगों को अपनी नर्सरी में तैयार विभिन्न प्रजाति के पौधे बांटे। वृक्षमित्र वास्तव में वृक्षमित्र हैं, इसकी झलक उन्होंने जिंदगी के अंतिम दिनों में भी दिखाई। वह अस्पताल में अपनी नर्सरी में तैयार तेजपात, सिलिंग आदि के सैकड़ों पौधे लेकर आए, जिन्हें हालचाल जानने आए परिचितों, अधिकारियों को बांटे।
कुंवर दामोदर पर बनेगी डाक्यूमेंट्री
डीडीहाट। सिने अभिनेता संजय मिश्रा वृक्षमित्र कुंवर दामोदर राठौर पर डाक्टूमेंट्री बना रहे हैं। इसकी काफी शूटिंग भी हो गई है। मिश्रा ने बताया कि जल्द ही डाक्यूमेंट्री फिल्म बना ली जाएगी। डाक्यूमेंट्री में कुंवर राठौर के पर्यावरण संरक्षण को दिए योगदान का उल्लेख होगा।